कल एक स्कूल के समय से मित्र के घर जाना हुआ। मित्र दूसरे शहर में नौकरी करते हैं, कुछ दिनों की छुट्टी लेकर घर आए हैं। बातचीत में जिक्र करने लगे कि बनारस में पिछले ११ सालों में अच्छे रोजगार के अवसर नहीं उपलब्ध हुए। कहने लगे कि नेहरु ने भेल, रेल कारखाने, स्टील अथोरीटी, आदि बड़े-बड़े संयंत्र खोले जिससे लोगों को रोजगार मिले। बताने लगे कि नेहरु की सरकार में बनारस में रेल इंजन कारखाना खुला था। मुझे उनकी छोटी सोच पर हंसी आ गई।
मैंने दोस्त से कहा कि तुम्हारी सोच पुरानी और घिसी-पिटी है। आलोचना से ग्रसित तुम्हारी आंखे नये जमाने की बातों को देख नहीं पा रहीं है। इतना बड़ा मंदिर कारिडोर बन गया है, वह तुमको नहीं दिखाई दे रहा है। कितने लोग घाटों पर ठेला-खोमचा लगा कर सामान बेच रहे हैं, वह रोजगार नहीं है?
दोस्त बिदक गए। बोले रेल इंजन कारखाने की नौकरी का ठेला लगाने से कोई मुकाबला है!
मैंने समझाया कि जमाना बदल गया है। तब देश ताजा आजाद हुआ था, पर हम मानसिक गुलाम थे। २०१४ के बाद से लोगों को नई आजादी मिली है, अपना चुनने की आजादी। रेल इंजन कारखाने में नौकरी लगेगी तो वही 9 से 5 की नौकरी करोगे। यहां आजादी है, जब मन करे ठेला लगाओ, जब मन न करे, मत लगाओ। रेल कारखाने में महीने के एक दिन तनख्वाह आएगी, वह भी कोई और तय करेगा की कितनी। यहां रोज कमाई है, वह भी मनमाने दाम पर। महंगा बेचो, सस्ता बेचो, तुम्हारी मर्जी। रेल कारखाने में तय छुट्टी है, वह भी लेने से पहले अपने सीनियर से स्वीकृत कराना पड़ता है। यहां जब मन करे छुट्टी ले लो। किसी से कोई आज्ञा लेने की जरुरत नहीं है। रेल कारखाने में एक कुर्सी दे दी जाएगी, एक जगह पर। वहीं रोज बैठना है। यहां कोई पाबंदी नहीं है। जहां मन करे ठेला लगाओ।

जहां इतनी आजादी है वह नौकरी अच्छी है या किसी के अंदर, बंध के काम करना अच्छा है!
दोस्त तुरंत ठेला लगाने वालों से रोजाना होने वाले दुर्व्यवहार और दुकान तोड़ने का हवाला देने लगे। अभी कुछ दिनों पहले बनारस में रेलवे स्टेशन के सामने ठेले वालों की दुकानों को तोड़ दिया गया, जिनको खुद प्रशासन ने जगह दी थी। अतिक्रमण हटाने के नाम पर भी अक्सर ठेले वाले भगाए जाते हैं। मैंने दोस्त को समझाया कि इसमें ठेले वालों का ही फायदा है।
दोस्त बिदक गए। बोले कि किसी का बसा-बसाया धंधा उजाड़ देने में क्या फायदा है?
मैनें बताया कि इसको मिड-कैरियर मोटीवेशन की तरह लेना चाहिए। एक ही काम करते-करते लोगों में एक तरह का आलस आ जाता है, कुछ बेहतर करने का प्रयास कम हो जाता है। कंपनी भी अपने कर्मचारियों को समय-समय पर ट्रेनिंग देती हैं। लोग नौकरी करते-करते पढ़ाई करते हैं, तरक्की पाने के लिए। ऐसा उनका आलस दूर करने के लिए किया जाता है। पर वह पुराना तरीका है, अंग्रेजों वाला। हम लोग सनातनी है हमारे यहां प्रलय की मान्यता है। पुराने को खत्म करके नए सृजन की परंपरा है। ठेले वाले को छोड़ दिया जाए तो उसकी तरक्की बंध जाएगी। समय-समय पर उसका धंधा उजाड़ देने से उसके अंदर नया सृजन करने की क्षमता का विकास होगा। इससे उसकी तकनीक भी उन्नत होगी। नया ठेला, नई तकनीक से बनाएगा।

दोस्त इतनी सब दलीलों से भी संतुष्ट नहीं हुए। होते भी कैसे? आलोचना करनी है बस और गुलामी का जीवन जीना है। यह भी हो सकता है कि ठेले की आजादी से जलते हों। जो भी हो, मैंने कह दिया कि यह नया भारत है, पुराने तौर-तरीके नहीं चलेंगे। यहां ठेलों की आजाद जिंदगी है। पुरानी नौकरी की आस छोड़ो।






बहुत बढ़िया