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अलविदा धर्मेंद्र

  • November 24, 2025
  • 1 min read
अलविदा धर्मेंद्र

रजत पट पर मर्दाना खूबसरती ( ही मैन ब्यूटी ) धमाका, धर्मेंद्र जी ने 300 से ज्यादा फ़िल्में कीं लेकिन, उनकी अभिनय क्षमता के रेखांकन के लिए अपनी बात ‘ सत्यकाम ‘ और ‘ फूल और पत्थर ‘ से रखना चाहूंगा । ‘ सत्यकाम ‘ पौराणिक कथा जबाल सत्यकाम पर आधारित एक कला फिल्म बल्कि क्लासिक है । उसके उलट ‘ फूल और पत्थर ‘ फार्मूला फिल्म जिसमें संभवतः पहली बार शरीर सौष्ठव की नुमाइश हुई । ‘ बाडी शो ‘ का चलन भी यहीं से शुरू हुआ लेकिन बाद की देह नुमाइश में जिम ढली काया तो थी, मर्दानगी गायब थी।

फ़िल्म ‘सत्यकाम ’ के संवाद लेखक राजेंद्र सिंह बेदी थे । सत्यकाम के दादाजी ( अशोक कुमार ) का यह डायलॉग आज तक याद है – ‘ सच बोलने का अभिमान नहीं… सच बोलने का साहस होना चाहिए ।’ फिल्म की शुरुआत एक कहानी से होती है —

सत्यकाम ने गुरु गौतम के पास जाकर कहा : भगवन मुझे अपना शिष्य बनाइये।
गुरु गौतम ने पूछा : तुम्हारा गोत्र क्या है ?

सत्यकाम ने कहा : मां से मैंने पूछा था । मां ने कहा बहुतों की सेवा करके तुम्हें पाया । इसलिए तुम्हारे पिता का नाम मैं नहीं जानती । लेकिन मेरा नाम जबाला है इसलिए तुम्हारा नाम जबाल सत्यकाम है।

गौतम ने सत्यकाम का सर चूमकर कहा : तुम्ही श्रेष्ठ ब्राह्मण हो, क्योंकि तुममें सत्य बोलने का साहस है।

फिल्म का नायक सत्यप्रिय आचार्य निहायत आदर्शवादी है । वह इंजीनियर है और ऐसे परिवार से आता है जिसमें पीढ़ियों से सत्य, धर्म और शुद्ध आचरण के प्रति घनघोर समर्पण और निष्ठा है । पिता तो परिवार छोड़कर संन्यासी भी बन गये और उसका बचपन ऋषि तुल्य दादा के सान्निध्य में गुज़रा है । सत्यप्रिय का सत्य के प्रति आग्रह और आचरण की शुद्धता दीवानगी की हद तक है । वह भ्रष्ट सिस्टम से अकेला लड़ता है।

ठेकेदार, इंजीनियर सत्यप्रिय आचार्य से एक ऐसे नक्शे पर दस्तखत चाहता है जो उसने नहीं बनाया । इंकार पर एक ब्लैंक चेक़ देता है जिसे सत्यप्रिय रिश्वत कहकर ठुकरा देता है।

* आप इसे रिश्वत कहते हैं।
– हुं !
* इसके भी भगवान कृष्ण की तरह 108 नाम हैं, आचार्य साहब । दिल्ली में इसे दस्तूरी कहते है । बिहार में … बंगाल में इसे बड़ी खुशी से कहते हैं पान खाने के दिए । तमिल और तेलगू में इस सुन्दरी को क्या कहते हैं मैं नहीं जानता । क्योंकि आप सच्चाई के पुतले हैं तो आपकी सहूलियत के लिए मैं इसका नाम आनरेरियम रखे देता हूं। लीजिये ।

( सत्यप्रिय आचार्य चेक फाड़ देता है )

– .राय साहब, तमिल और तेलगू में तो इसका नाम मैं भी नहीं जानता मगर हर भाषा में इसका जवाब यही है ।

दूसरी जगह दूसरे ठेकेदार से विवाद होता है और हमारा हीरो फिर अपनी ठसक के साथ सच के पक्ष में खड़ा हो जाता है । उसके जाने के बाद ठेकेदार अपने मुनीमनुमा मुसाहिब से कहता है : ‘हर आदमी की अपनी-अपनी कीमत होती है।’

सत्यप्रिय आचार्य को कैंसर हो जाता है और दुनिया यहां तक कि खुद से भी लड़ते हुए सत्यप्रिय इस दुनिया से विदाई ले लेता है । धर्मेंद्र जी ने सत्यप्रिय की भूमिका बेहतर अभिनय की अकल्पनीय ऊंचाई पर जी है । इस एक फिल्म में उनका अभिनय उन्हें दिलीप साहब तक की बराबरी में खड़ा कर देता है । यह फिल्म मैंने सात बार देखी है।

धर्मेंद्र और मीना कुमारी की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री वाली जिस फिल्म ने अपार लोकप्रियता हासिल की वह थी — फूल और पत्थर । शाका ( धर्मेंद्र जी ) अपराधी है । उसे हालात ने अपराधी बनाया लेकिन उसमें गज़ब की मानवीयता और करुणा है । उसमें औरत की इज्जत, उसके साथ होना और प्रेम में पड़ जाने की सलाहियत है । एक नैतिक अपराधी की भूमिका धर्मेंद्र पा ने बहुत शिद्दत से जी है।

दुनिया के सबसे हैंडसम पुरुषों में शुमार धर्मेंद्र ने जहां एक तरफ धीर गंभीर भूमिकाओं में अपनी छाप छोड़ी तो दूसरी तरफ अपनी कॉमिक टाइमिंग का भी लोहा मनवाया।

About Author

राघवेन्द्र दुबे

तीन दशकों से अधिक समय तक विभिन्न राज्यों और प्रकाशनों में सक्रिय हिंदी पत्रकारिता के अनुभव के साथ, राघवेन्द्र दुबे भारत के राजनीतिक, सिनेमाई और सांस्कृतिक परिदृश्य को गहरी संवेदनशीलता और पैनी नज़र से देखा है। आज उनका जीवन सूत्र है – “ज़िंदगी से इश्क़ करो” ताकि भरपूर जिया जाए और पूरे जुनून से लिखा जाए। राजनीति, फ़िल्मों और संस्कृति के प्रति उनका अटूट प्रेम आज भी उनकी लेखनी को आकार देता है और उन्हें पाठकों से जोड़े रखता है