लोरेस ऑफ लव एंड संत गोरखनाथ – सह-लेखक नलिन वर्मा के साथ साक्षात्कार
निम्नलिखित पुस्तक बैठक साक्षात्कार का अंग्रेजी प्रतिलेख है जिसमें लेखक नलिन वर्मा अपनी नवीनतम कृति, लोरेस ऑफ लव एंड सेंट गोरखनाथ, जो लालू प्रसाद यादव के साथ सह-लिखित है, के बारे में बात कर रहे हैं।
गौरव तिवारी: आज हमारे पॉडकास्ट के सातवें एपिसोड में हमारे साथ हैं वरिष्ठ पत्रकार और लेखक नलिन वर्मा जी। हाल ही में इन्होंने लालू प्रसाद यादव जी के साथ मिलकर एक नई किताब लिखी है,लोर्ज़ ऑफ लव एंड सेंट गोरखनाथ। इस किताब पर आज हम चर्चा करेंगे। नलिन जी, आपका स्वागत है।
नलिन वर्मा: धन्यवाद, अपने प्लेटफ़ॉर्म पर आमंत्रित करने के लिए। आपके श्रोताओं को भी हार्दिक धन्यवाद और शुभकामनाएँ
गौरव तिवारी:सर, हम लोग पहला सवाल इस बात से शुरू करेंगे कि संत गोरखनाथ कौन थे, और उनकी शिक्षा के किस पहलू ने आपको इस किताब को लिखने के लिए प्रेरित किया?
नलिन वर्मा: देखिए, संत गोरखनाथ ग्यारहवीं शताब्दी के संत थे। जहां तक उनकी दर्शन की बात है, हम बहुत गहराई में नहीं जाएंगे, लेकिन इतना जरूर कह सकते हैं कि अगर गोरखनाथ नहीं होते तो कबीर, नानक, दादू, वाजिद जैसे संतों की जो भक्ति आंदोलन की धारा है, वह संभव नहीं होती। भक्ति और सूफी आंदोलन दोनों में गोरखनाथ की भूमिका केंद्रीय रही है।
भारतीय संत परंपरा पर सबसे गहन काम ओशो रजनीश ने किया है। सुमित्रानंदन पंत,जो हिंदी के बहुत बड़े कवि थे, ने उनसे एक बार समय लिया था। ओशो से भारतीय संत और सूफी परंपरा को समझने के लिए उन्होंने पूछा कि भारतीय संत परंपरा के १२ प्रमुख संतों के नाम बताइए। ओशो ने पतंजलि, बुद्ध, कृष्ण सहित १२ नाम लिए। फिर उन्होंने कहा कि सूची लंबी हो गई है, इसे सात पर ले आइए। सात नामों में भी गोरखनाथ का नाम कॉमन था।
फिर पंत ने कहा कि इसे चार नामों तक सीमित करिए। तब उन्होंने कहा, कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध और गोरखनाथ। जब पंत ने पूछा कि इसे तीन पर लाया जाए तो गोरखनाथ को क्यों रखा जाए, ओशो ने जवाब दिया कि अगर गोरखनाथ को निकाल देंगे तो ग्यारहवीं शताब्दी के बाद भारत में जो भी संत परंपरा, भक्ति और सूफी आंदोलन, साहित्य और योग की परंपरा चली है, वह समाप्त हो जाएगी। गोरखनाथ को हटाया नहीं जा सकता। वह उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना कृष्ण, बुद्ध और पतंजलि। यह बात हमें अध्ययन के आधार पर समझ में आई।
इसके बाद दूसरी बात जिसने हमें प्रभावित किया, वह यह कि गोरखनाथ के समय की जितनी कहानियाँ हैं, वे उनसे प्रभावित थीं। जैसे हीर-रांझा की कहानी, जो एक कालजयी कथा है, पंजाब में लिखी गई थी, फिल्म भी बनी है, आप सब जानते होंगे। हीर-रांझा की कहानी, हमारे यहाँ सोरठी-बिर्जाभार में गाई जाती है। बनारस, अवध और भोजपुरी क्षेत्र में योगी लोग इसे गाते हैं। पंजाब में शायद शिक्षा और साहित्य अधिक रहा हो, वहाँ के कई पंजाबी लेखकों ने इसे लिखा है। ब्रिटिश लेखक नेईल राथमेल ने भी इसमें हमारी मदद की और वारिस शाह की हीर-रांझा को पुनःअनुवादित किया है।
हमारे यहाँ सोरठी-बिर्जाभार के गायन बहुत हुए | योगी लोग गाते थे, नाच-गाने वाले भी गाते थे। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर पुनःअनुवादित हुई कि मेरे मन में विचार आया कि यह हीर-रांझा से कम नहीं है। यह एक प्रेरणा थी। इसलिए मैंने इस पर काम किया।
अधिकांश कहानियाँ प्रेम कथाएँ हैं, जो गोरखनाथ के समय की हैं। कह सकते हैं कि इतने महान संत परंपरा के मूल में होते हुए भी, जो भक्ति आंदोलन के केंद्र में हैं, उन्हें भारतीय परंपरा का पहला प्रेम गुरु भी कहा जा सकता है। उदाहरण के लिए, रांझा उनके शिष्य थे, जो हीर से प्रेम करते थे। सोरठी-बिर्जाभार में बिर्जाभार भी उनके शिष्य थे।
पिंगला और भर्तृहरि को उन्होंने कामवासना से निकालकर योगी बनाया। रानी सरंगा, सदाब्रिज, ये भी गोरखनाथ के शिष्य थे। ये सभी लोग प्रेम में डूबे हुए थे, गहरी मोहब्बत करते थे। सोरठी, हीर-रांझा की कहानी तो बहुत ही दुखद है, अंत में बेहद पीड़ादायक।
इन सभी कहानियों में इतना मनोरंजन है कि लोग इन्हें आनंदपूर्वक पढ़ते हैं। इनमें दैत्य, भूत, जिन्न, डाइन, सबका समावेश है, जो पढ़ने में नाटकीय लगता है। तो साहित्य के दृष्टिकोण से भी, मनोरंजन के दृष्टिकोण से भी लोग इसे खूब पसंद करते हैं। तो ये दो बातें थीं जिन्होंने हमें इस कहानी को लिखने के लिए प्रेरित किया।
गौरव तिवारी: जब इस किताब की बैठक के बारे में हमने बात की, तो आपने बताया कि इसमें मुख्य रूप से चार प्रसिद्ध प्रेम कथाएँ शामिल हैं — जैसे हीर-रांझा, सोरठी-बिर्जाभार, भर्तृहरि-पिंगला आदि। इन कहानियों पर बातचीत के दौरान यह सवाल भी उठता है कि इस किताब के सह-लेखक लालू प्रसाद यादव जी को आम जनमानस एक अलग छवि में देखता है, और लोग उन्हें इस तरह की प्रेम और संत परंपरा से जोड़कर नहीं देखते| तो इस किताब पर आप दोनों का सहयोग कैसे हुआ, और इस पुस्तक में उनकी क्या भूमिका रही?
नलिन वर्मा: देखिए, इस किताब में उनकी भूमिका बहुत अहम रही है। आपको बता दूँ कि 2017–18 में मैंने उनकी एक किताब लिखी थी,गोपालगंज टू रायसीना, जो उनकी आत्मकथा है। उस समय वे जेल में थे, और हम बहुत मुश्किल से उनके साथ समय बिता पाते थे। हालांकि, जब भी मौका मिलता, घंटों बातचीत होती थी। कभी-कभी अस्पताल में भी मिलते थे।
लालू प्रसाद जी ने ही सोरठी-बिर्जाभार की कहानी सुनाई थी। उस समय हम जल्दी में थे क्योंकि उनका बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग टूट चुका था। लोग उन्हें देखने आते थे, लेकिन जेल में होने के कारण उनसे मिल नहीं पाते थे। लोगों के मन में उनकी छवि एक जननेता की थी, और वही संवाद हम उनकी राजनीतिक जीवनी में दर्ज कर रहे थे। लेकिन बार-बार वे राजनीतिक सवालों से हटकर कहते थे, “जालिम देव पर क्यों नहीं लिखते हैं वर्मा जी?” और फिर वे एकिया होरामा गाने लगते थे।
हमें आश्चर्य होता था कि इतना सख्त नेता, जननेता, जेल में रहते हुए भी लोककथाओं में इतनी रुचि क्यों ले रहा है। लेकिन यही बात हमें प्रेरित करने लगी। उन्हें पूरी कहानियाँ याद नहीं होती थीं, लेकिन कुछ अंश उन्हें याद रहते थे। उन्हें यह भी नहीं पता था कि ये कहानियाँ गोरखनाथ से प्रेरित हैं, न उन्होंने इसे अकादमिक रूप से पढ़ा था। लेकिन बाबा गोरखनाथ का नाम वे बार-बार लेते थे, जो उन्होंने लोगों से सुना था, खासकर अपने बचपन में।
वो जब फुलवरिया गाँव में रहते थे, जो उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की सीमा पर स्थित गोपालगंज का एक गाँव है,वहाँ उन्होंने सुरठी ब्रजभ, हीर-रांझा, जोगियों का नाच और लोकगीतों के बीच अपना बचपन बिताया। और यही लोक परंपरा उनके भीतर आज भी जीवित है।
जब वे ये सब सुनाते थे, तो हमें लगता था कि यह राजनीतिक जीवनी से एक तरह का विचलन है। लेकिन जब किताब छप गई, तब समझ में आया कि लालू यादव की व्यक्तित्व का यह पहलू बहुत कम लोग जानते हैं। हाँ, वे आम भाषा में भाषण देते हैं, लोगों की जुबान में बोलते हैं, बहुत सारे मुहावरे और कहावतें इस्तेमाल करते हैं। लेकिन उनके भीतर लोक जीवन और लोक कथाएँ गहराई से रची-बसी हैं।
इस रूप में उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। अगर उस समय उनसे बातचीत न हुई होती, तो शायद यह किताब लिखने की प्रेरणा हमें नहीं मिलती, या बहुत बाद में मिलती। इसलिए आपने यह सवाल पूछा, यह बहुत अच्छा किया। वरना पाठकों के मन में यह बात पहुँचना जरूरी था,और अब पहुँचेगी।
गौरव तिवारी: सर, इस किताब में जो चार कहानियाँ हैं, उनमें चार मुख्य किरदार हैं जिनके इर्द-गिर्द ये कथाएँ बुनी गई हैं। कृपया उनके बारे में संक्षेप में बताइए। साथ ही यह भी बताइए कि ये केवल प्रेम कथाएँ नहीं हैं, बल्कि इनमें आध्यात्मिकता का एक व्यापक संदेश भी निहित है|
नलिन वर्मा: देखिए, सबसे पहली कहानी है सुरठी-बृजभ की। ये दोनों पात्र जब धरती पर आए, तब इन्हें यही नाम मिला। लेकिन इनका मूल स्वर्गलोक में था, ये इंद्र के दरबार की परियाँ थीं: पंचशिखा, सुमाला और सुनंदा। ये अत्यंत सुंदर और प्रभावशाली थीं।
कहानी यह है कि गोरखनाथ एक महान योगी थे, जो गहन तपस्या में लीन थे। इंद्र को हमेशा संतों से खतरा महसूस होता था, उन्हें लगता था कि कोई संत उनकी स्वर्ग सत्ता को चुनौती दे सकता है। इसलिए उन्होंने अग्निदेव को भेजा कि गोरखनाथ की तपस्या भंग करें। लेकिन अग्नि के सारे अस्त्र-शस्त्र निष्प्रभावी हो गए, वे गोरखनाथ को छू भी नहीं सके।
तब इंद्र ने अपनी दरबार की सबसे सुंदर और कुशल नर्तक-गायिकाओं, पंचशिखा, सुमाला और सुनंदा को भेजा कि वे गोरखनाथ को मोहित करें। जब वे जंगल में पहुँचीं, तो जहाँ जातीं वहाँ फूल खिलते, मोर नाचते, बारिश होती, पूरा वातावरण आनंदमय हो जाता। लेकिन गोरखनाथ पर कोई असर नहीं पड़ा। जब वे उसकी तपस्या की सीमा में पहुँचीं और नृत्य करने लगीं, तब गोरखनाथ विचलित हुए। उन्होंने क्रोध में हाथ उठाया, जिससे अग्नि प्रकट हुई और परियाँ जलने लगीं।
वे गोरखनाथ के चरणों में गिर पड़ीं और क्षमा माँगी। गोरखनाथ ने कहा कि अब तुम स्वर्ग में नहीं लौट सकतीं, तुम्हें धरती पर ही रहना होगा, कई जन्मों तक संघर्ष करना होगा। पंचशिखा बाद में बृजभ बनीं, सुमाला और सुनंदा सुरठी बनीं। इन पात्रों को पुनः मिलन के लिए अनेक जन्मों और कठिनाइयों से गुजरना पड़ा। इस कहानी में प्रेम के साथ-साथ आध्यात्मिक संघर्ष और मोक्ष की यात्रा भी है।
दूसरी कहानी है भर्तृहरि और पिंगला की। पिंगला अत्यंत सुंदर थी, लेकिन विश्वासघाती थी। वह एक अश्वपाल से प्रेम करती थी, और भर्तृहरि को धोखा देती थी। भर्तृहरि को यह ज्ञात नहीं था। गोरखनाथ ने अपना रूप बदलकर उन्हें यह सच्चाई दिखाई। उन्होंने भर्तृहरि को समझाया कि यह संसार वासना और मोह से भरा है, अगर तुम इससे मुक्त नहीं हुए, तो हर बार यही मिलेगा। अंततः भर्तृहरि को वैराग्य हुआ और वे नाथ संप्रदाय के प्रसिद्ध संत बने।
तीसरी कहानी है रानी सरंगा और सदाब्रिज की। ये भी पूर्व जन्मों की परियाँ थीं, जिन्होंने कई जन्मों तक संघर्ष किया, भूत, डाइन, जंगल, तांत्रिक शक्तियों से जूझीं, और अंततः पुनर्मिलन हुआ।
तो इसलिए ये कहानियाँ सिर्फ प्रेम की नहीं हैं, ये आत्मा के संघर्ष, पुनर्जन्म, मोक्ष और लोक परंपरा की गहराई को दर्शाती हैं।
इनमें आध्यात्मिकता का जो संदेश है, वह यही है कि प्रेम केवल सांसारिक आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा का एक माध्यम है। गोरखनाथ जैसे संत इन पात्रों को मोह और वासना से निकालकर योग और साधना की ओर ले जाते हैं।
हर कहानी में एक रूपांतरण है, चाहे वह भर्तृहरि का वैराग्य हो, सोरठी-बिर्जाभार का पुनर्मिलन, या सदाब्रिज और रानी सारंगा का संघर्ष। ये सभी पात्र प्रेम में डूबे हुए हैं, लेकिन अंततः उन्हें आत्मबोध और मुक्ति की ओर ले जाया जाता है।
इसलिए इन लोककथाओं में न केवल मनोरंजन है, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी है, जो आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस युग में था। यही कारण है कि हमने इन कहानियों को लोर्ज़ ऑफ लव एंड सेंट गोरखनाथ में संजोया।
गौरव तिवारी:कहानियाँ बहुत ही सुंदर हैं। इन्हें बहुत अच्छे तरीके से लिखा गया है। मेरे जैसे एक सामान्य पाठक के लिए, जिसे इन कहानियों की पूर्व जानकारी नहीं थी, पढ़ना बहुत रोचक अनुभव रहा। किताब को आराम से पढ़ा जा सकता है, और मन भी पूरी तरह लगा रहता है।
इस किताब में लगभग हर कहानी में जाति का ज़िक्र आता है। प्रेम के बीच में जाति एक बाधा के रूप में सामने आती है, और आपने बताया कि ये कहानियाँ 11वीं सदी की हैं। तो उस समय भी प्रेम के मार्ग में जाति एक रुकावट थी। इस पर आप क्या कहेंगे?
नलिन वर्मा: हाँ, जाति का पहलू इन कहानियों में स्पष्ट रूप से सामने आता है, विशेष रूप से रानी सरंगा और सदाब्रिज की कथा में। हिंदू वर्णाश्रम व्यवस्था की जो पदानुक्रम है, वह बहुत पुरानी है, मनुस्मृति और उपनिषदों के बाद से ही इसका प्रभाव रहा है। लेकिन संत गोरखनाथ इस व्यवस्था के कट्टर विरोधी थे। वे अत्यंत समावेशी थे, जाति की बात तो छोड़िए, उन्होंने अपने मठ-संबंधी संप्रदाय में हर वर्ग के लोगों को स्थान दिया।
ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक इस्लाम का भी भारत में प्रभाव फैल चुका था। हीर-रांझा की कथा में रांझा मुसलमान थे। गोरखनाथ के संप्रदाय में ब्राह्मण ही पुजारी हों, ऐसा बिल्कुल नहीं था। उसमें बुनकर, रंगरेज, दलित और मुस्लिम समुदायों के लोग भी शामिल थे। वे भिक्षाटन करते थे, सारंगी बजाते थे, और गुरु-शिष्य की पहचान तक धुंधली हो जाती थी। गुरु भी शिष्यों के साथ भिक्षा मांगते थे। इसमें अधिकांश लोग वंचित वर्गों से आते थे, लेकिन उन्हें योगी के रूप में प्रतिष्ठा मिलती थी।
गोरखनाथ का चरित्र अत्यंत सार्वभौमिक था। उनके अनुयायियों में वर्धानाथ जैसे संत थे, जिन्हें उन्होंने दीक्षा दी थी। गोरखनाथ घूमते-घूमते वर्धानाथ के साथ एक स्थान पर रुके, जहाँ आज गोरखनाथ मंदिर है। वहीं लोगों ने एक छोटा सा मंदिर बना दिया, और वही स्थान आगे चलकर गोरखपुर कहलाया।
गोरखनाथ का प्रभाव जनमानस पर इतना गहरा था कि 17वीं–18वीं शताब्दी तक वह स्थान एक साधारण तीर्थ बना रहा। उस समय बाबा बुद्धनाथ वहाँ के पुजारी थे, और बाबा रोशन अली एक सूफी फकीर थे। दोनों साथ रहते थे। नवाब असफुदौला ने बाबा के मंदिर के लिए 52 एकड़ ज़मीन दी, और बाबा बुद्धनाथ व रोशन अली ने मिलकर वहाँ जो भव्यता आज दिखती है, उसकी नींव रखी।
1930 के दशक में एक बदलाव शुरू हुआ। 1937 में सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और दिग्विजयनाथ गोरखपुर में हिंदू महासभा के प्रमुख बने। उनके पहले के महंत तपस्वी थे, राजनीति से दूर रहते थे। लेकिन दिग्विजयनाथ ने चुनाव लड़ा, जीता, और उनके बाद अवैद्यनाथ भी राजनीति में आए। फिर आदित्यनाथ हुए, जिन्हें आज सब जानते हैं।
इस तरह 1930 के बाद से गोरखनाथ की समावेशी परंपरा, जो कबीर, नानक और सूफी परंपरा से जुड़ी थी, धीरे-धीरे दबती चली गई। एक नया राजनीतिक प्रतीक बनने लगा, जो गोरखनाथ की मूल भावना से बिल्कुल विपरीत था।
गोरखनाथ का मंदिर आज भी मुस्लिम बहुल इलाके में है, और उसके सामने बाबा रोशन अली की मजार है। पश्चिमी विद्वानों ने भी इस पर शोध किया है, पंजाब, राजस्थान और नेपाल में कई मुस्लिम योगी गोरखनाथ की परंपरा से जुड़े हैं। नेपाल के गोरखा भी इसी परंपरा से आते हैं।
तो इन कहानियों के माध्यम से हमारी यही उम्मीद है कि पाठक सामाजिक समरसता को समझें। हर कहानी में एक केंद्रीय चरित्र हैं, स्वयं संत गोरखनाथ, जो अलग-अलग रूपों में, अलग-अलग समय में प्रकट होते हैं। उनका संदेश प्रेम, समावेश और आध्यात्मिकता का है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
गौरव तिवारी: इन कहानियों में एक केंद्रीय पात्र हैं, स्वयं संत गोरखनाथ जो हर कथा में अलग-अलग रूपों में, अलग-अलग समय में प्रकट होते हैं। इन सभी कहानियों में उनका मार्गदर्शन मौजूद है।
तो सामाजिक समरसता को लेकर आपकी क्या अपेक्षा है? क्या आप मानते हैं कि इन कहानियों को पढ़ने के बाद पाठक गुरु गोरखनाथ की परंपरा को एक समावेशी और मेल-जोल की संस्कृति के रूप में देख पाएंगे?
नलिन वर्मा: देखिए, जब लोग इन कहानियों को पढ़ेंगे, तो आज के दौर में, जहाँ गाँवों में सामुदायिक जीवन धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है, वहाँ ये कहानियाँ एक नई चेतना ला सकती हैं। पहले लोग कहानियाँ सुनते थे, योगी गाते थे। अब वो परंपरा बदल चुकी है। 1990 के बाद से नई टेक्नोलॉजी और नई अर्थव्यवस्था गाँवों तक पहुँच गई है, जिससे सामुदायिक जीवन पर पर्दा पड़ गया है।
इन कहानियों में मनोरंजन है, और आज भी बच्चों को ऐसी कहानियाँ आकर्षित करती हैं। जैसे किसी युवा ने मुझे याद दिलाया कि मोगली जंगल में कबूतरों और चिड़ियों से बात करता है, बच्चे आज भी उसे ध्यान से देखते हैं। भूतों की कहानियाँ, चाहे आप उन पर विश्वास करें या न करें, बच्चों को हमेशा आकर्षित करती हैं। रस्किन बॉन्ड ने भी लिखा है कि भूतों की कहानियाँ मनोरंजन देती हैं। हर पीढ़ी में हॉरर स्टोरी का क्रेज रहा है।
तो जब लोग इन कहानियों को पढ़ेंगे, तो कम से कम इतना तो होगा कि वे सोचेंगे, गोरखनाथ कौन थे? उनकी कहानियाँ कितनी रोचक हैं। अगर ये कहानियाँ ऐसी ही बनी रहें, तो क्या दिक्कत है? ये तो मौलिक हैं। जब पाठक इन्हें पढ़ेंगे, तो उनका मन लगेगा। जब मन लगेगा, तो रुचि जागेगी, और जब रुचि जागेगी, तो जानकारी बढ़ेगी। जानकारी के साथ संवेदनशीलता भी बढ़ेगी।
इस रूप में ये कहानियाँ समाज को प्रभावित करेंगी, और शायद सामाजिक समरसता की दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम बनेंगी।
गौरव तिवारी:आज के परिप्रेक्ष्य में, वर्तमान दौर में आप क्या देखते हैं, संत गोरखनाथ की जो शिक्षाएँ थीं, वे आज के समय में कितनी महत्वपूर्ण हैं? और इन कहानियों के माध्यम से उनकी शिक्षाएँ, उनके उपदेश, लोगों तक कैसे पहुँचते हैं, ये कहानियाँ किस तरह उनकी विचारधारा को जनमानस के बीच ले जाने में मदद करती हैं?
नलिन वर्मा:
देखिए, आज का दौर चाहे जैसा हो, अभी हम ऑफलाइन बात कर रहे थे, तो मोगली की कहानी याद आई। हीर-रांझा की कथा, जिसे वारिस शाह ने 18वीं सदी में लिखा था, और सोरठी की कहानियाँ, ये सब पुरानी हैं। लेकिन मेरा कहना यह है कि कहानियाँ पुरानी नहीं होतीं, दौर बदलते रहते हैं।
आप दौर को इस तरह मत समझिए कि कहीं लालू यादव का दौर है, कहीं अखिलेश यादव का, कहीं नरेंद्र मोदी का। ये सब बहुत क्षणिक हैं, पाँच, दस, पंद्रह, बीस साल से ज़्यादा नहीं चलते। अगर कोई दौर है, कोई प्रभाव है, तो वह पाँच सौ, छह सौ, सात सौ साल तक चलता है।
गोरखनाथ, कबीर, जो आपके बनारस के ही हैं, उनका दौर खत्म नहीं हुआ है। वह आज भी चल रहा है। यही वह दौर है जिसकी कहानियाँ हम सुनाते हैं। बाकी जो आप राजनीतिक या सामाजिक परतों को दौर मानते हैं, वे तो आते हैं और चले जाते हैं।
इसलिए कबीर का दौर, भक्ति का दौर, यही विश्वव्यापी स्टोरी है, यही अनन्त स्टोरी है। इसमें समय की कोई सीमा नहीं है। हम कोई नई बात नहीं कह रहे हैं, हम वही कह रहे हैं जो सदियों से कहा जा रहा है। हीर-रांझा की कहानी क्यों नहीं जाननी चाहिए? जब आप जानेंगे, तो किसी भी दौर में आप उसे समझ पाएंगे।
अगर हम हीर-रांझा, भक्ति आंदोलन, कबीर, गोरखनाथ को नहीं जानते, तो यह एक तरह की जानकारी की कमी है। और यह जानना जरूरी है, क्योंकि ये कहानियाँ समय से परे हैं।
तो क्यों जरूरी है जानना? क्योंकि अगर आप अपनी माँ, अपने पिता, अपने पूर्वजों, अपनी परंपरा, अपने विरासत को नहीं जानेंगे, तो आगे कैसे बढ़ेंगे? हमने एक छात्र से पूछा, हमारे पूर्वज कौन हैं? एक तो जैविक पूर्वज हैं, लेकिन दूसरे हमारे सांस्कृतिक पूर्वज हैं, कालिदास, वाणभट्ट, तुलसी, कबीर, हेमिंग्वे, आर्यभट्ट।
इंसानियत किसी सीमा में नहीं बंधती। आज से 75 साल पहले भारत कुछ और था, पाकिस्तान नहीं था, बांग्लादेश भी भारत का हिस्सा था। उससे पहले और भी अलग भौगोलिक स्थिति थी। देश की सीमाएँ स्थायी नहीं होतीं, जर्मनी कभी पूर्व और पश्चिम में बँटा था, फिर एक हो गया। सीमाएँ बदलती रहती हैं।
लेकिन जो मानवीय मूल्य हैं, माँ का प्रेम, प्रेमी का अपने प्रिय से लगाव, पिता का स्नेह, संवेदनशीलता, ये हमेशा एक जैसे रहते हैं। इन्हीं से कहानियाँ निकलती हैं। यही उन्हें टाइमलेस बनाता है।
ये कभी नहीं बदलते। इंग्लैंड या यूरोप में अगर किसी बच्चे को भूख लगे या कोई परेशानी हो, तो उसकी माँ को जो पीड़ा होगी, वही पीड़ा किसी भारतीय माँ को भी होगी। दर्द और खुशी बाँटी नहीं जाती, यही मानव कथा है।
और यही मानव मूल्य हैं, ये सभी मूल्यों से ऊपर होते हैं। ये राष्ट्रवाद से भी ऊपर हैं, किसी विशेष धार्मिक पहचान से भी ऊपर हैं, चाहे वह हिंदुत्व हो या इस्लाम। इन्हें किसी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। ये सबके लिए हैं। यही इन कहानियों का सार है।





