उन्होंने लिखा – ‘ 6 दिसंबर ( 1992 ) को मैंने उत्तर भारत के अयोध्या में एक ऐतिहासिक मस्जिद को हिंदू राष्ट्रवादियों के हाथों नष्ट होते देखा था । इसे हिंदुओं के भगवान राम का जन्मस्थल माना जाता है ।
यह हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी के उस अभियान का नतीजा था जिसमें वो मस्जिद को तोड़ कर उसकी जगह पर मंदिर बनाना चाहते थे । लगभग 15 हज़ार लोगों की भीड़ अचानक आगे बढ़ी और उसने मस्जिद को बचाने के लिए बने पुलिस घेरे को तोड़ते हुए मस्जिद के बुर्ज़ पर चढ़ाई कर दी और पल भर में उसे तोड़ने का काम शुरू हो गया । ‘

मार्क टली, एमजे अकबर, जय प्रकाश शाही, अप्रतिम, विरल गद्यकार अनिल यादव और मेरे सामने सेक्युलरिज्म जो भारत की सुदीर्ध परम्परा की आंतरिक संरचना – सज्जा और प्राण ऊर्जा है, ( सेक्युलरिज्म इज इंटीग्रल टू इंडियन ट्रेडिशन ) की लाश पड़ी थी । मार्क टुली की बेचैनी खूब याद है और वह पीड़ा भी – ‘ ये क्या हो रहा है ? ‘ मार्क टुली शायद खुद से या मुझसे कुछ पूछ रहे थे जो गलियों में हिंसा के नंगे नाच, अंधी आस्था के नगाड़े की कड़कड़, तुरही की ललकार, त्रिशूल, भाले और तलवारों के शोर में मैं नहीं सुन सका । हो सकता है यह उन्होंने खुद से ही पूछा हो –‘ तो क्या यह सेक्युलर, सोशलिस्ट रिपब्लिक भारत का अंत है, मुस्लिम शासकों की कथित मध्ययुगीन बर्बरता का उतना ही, वैसा ही बर्बर जवाब ।’
वह खुद से ही कह रहे थे और अपने ठीक बगलगीर मुझे देखते हुए –‘ ये इतिहास से सबक लेने वालों की नहीं, इतिहास से अनबन बढ़ाने और उसे ही खोदने वालों का हुजूम है ।’
उन्होंने कहा – ‘ यह उस भयावह समय की शुरुआत है जिसका अंत फिलहाल नहीं दिखायी देता ‘ और सचमुच ऐसा ही हो गया , मौजूदा मोदी दौर उसका चरम है ।
मैं उस समय हिंदी अख़बारों के हिंदू हो जाने के दौर में मार्क टुली में अजीब अस्तित्वगत फड़फड़ाहट देख रहा था जो सुनने – सुनाने के मार्मिक प्रसंग होने की भी हदें भी पार कर चुका है ।
मार्क टुली बदहवास से कुछ लगातार बुदबुदा रहे थे । उनकी नजर 30 – 40 साल बाद के सांस्कृतिक फासिज्म के धमाके पर थी , जब साम्प्रदायिक ताकतें समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था के हर हलके में काबिज हो चुकी होगीं । क्या ऐसा ही हो नहीं गया, जिसका डर था मार्क टुली को । देश की वैविध्यपूर्ण संस्कृति पर समतलीकरण और एकीकरण का रोड रोलर चल रहा है ।

मार्क टली गांधी – नेहरू की नजर भारत को देखने – समझने वाले सच्चे भारतीय पत्रकार थे जो लंबे समय तक भारत में बीबीसी के ब्यूरो चीफ रहे । बीबीसी की औपचारिक सेवा से अवकाश-प्राप्ति के बाद भी वह पत्रकार और लेखक के रूप में सक्रिय रहे । उनकी ‘अमृतसर: मिसेज गांधी लास्ट बैटिल’, ‘द हार्ट ऑफ इंडिया’ ,’इंडिया स्लो मोशन’ , ‘नो फुल स्टाॅप इन इंडिया’ और ‘ नाॅन स्टाॅप इंडिया ‘सहित कई उल्लेखनीय किताबें हैं । वह भारत सहित समूचे दक्षिण एशिया में अपनी रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक खबरों के लिए अस्सी के दशक में ही ‘लिजेंन् ‘ बन चुके थे ।
वह खबरों की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता के उपमा और रूपक Simile और Metaphor दोनों ही थे और भारत में उन्हें अपार लोकप्रियता हासिल थी ।
मुझे गर्व है मैं बाबरी ध्वंस ( डिमालिशन ) के समय अयोध्या में मार्क टुली जैसे विश्व प्रसिद्ध पत्रकार के साथ कुछ घंटे / दिन बिता चुका हूं और उन्हें क्लोजली आब्जर्ब कर सका, उनसे कुछ सीखा भी ।
विनम्र श्रद्धांजलि । लाख सैल्यूट मार्क टुली ।