हमारा नेता कैसा हो ?
एक असरदार विधायक में कौन से गुण होने चाहिए — और मतदाता उसे किस आधार पर परखें? राजनीतिक विश्लेषक गौरव तिवारी इस अहम सवाल को बारीकी से समझने की कोशिश करते हैं।
“अगर आप अपने इलाके के विधायक बन जाएं, तो क्या करेंगे?” — यह सवाल मैंने राजहंस से पूछा जो बिहार के सिवान जिले के एक युवा मतदाता हैं।
राजहंस ने हाल ही में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में पीएचडी की है। उन्होंने बड़े उत्साह से जवाब देना शुरू किया — कहा कि वे अपने इलाके में एक डिग्री कॉलेज खोलेंगे। फिर रुके, अपनी बात बदली, और फिर दोबारा बदली। धीरे-धीरे उन्हें यह समझ आया कि एक विधायक पांच साल के कार्यकाल में ऐसा बहुत कुछ कर ही नहीं सकता।

बातचीत आखिर में असली सवाल पर आ गई — एक विधायक वास्तव में क्या कर सकता है? और सबसे ज़रूरी बात, उसे असरदार बनाने वाले गुण कौन से हैं?
ज्यादातर मतदाता, अखबारों की खबरों और गली-मोहल्ले की राजनीति से प्रभावित होकर, अपने विधायक को सड़क, पानी, बिजली, अस्पताल और सरकारी आवास योजनाओं का इंतज़ाम कराने वाला मानते हैं। लेकिन इनमें से ज्यादातर काम ज़िला प्रशासन के दायरे में आते हैं, विधानसभा के नहीं। संविधान ने विधायक को जो ज़िम्मेदारी दी है, वह कुछ अलग ही है।
संविधान बनाने वालों ने क्या सोचा था?
सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील संजय हेगड़े बताते हैं, “1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट को ही भारतीय संविधान में दोहराया गया, वेस्टमिंस्टर मॉडल के तरीके से। संसद या विधानसभा के सदस्यों का काम कानून बनाना और उन पर बहस करना था — सरकारी मशीनरी को सीधे चलाना या उसे आदेश देना नहीं।”
यानी, औपचारिक रूप से एक विधायक का काम है — कानून बनाना या उनमें बदलाव करना, दूसरे सदस्यों के लाए कानूनों पर वोट देना, और मंत्रियों से उनकी योजनाओं या इलाके से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछना।
लेकिन हकीकत में एक अलग ही भूमिका बन गई है। संविधान की मंशा से अलग, ज़मीनी मांग के चलते, विधायकों ने धीरे-धीरे सरकारी अफसरों पर सीधा या परोक्ष नियंत्रण हासिल कर लिया है।

हेगड़े कहते हैं, “सीमित संसाधनों की मांग ने शायद इस बदलाव को बढ़ाया।”
विधायक के काम में यह बदलाव और तेज़ हुआ 1993 में, जब पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने सांसद निधि (MPLAD) योजना शुरू की। यह योजना पहले सांसदों के लिए लाई गई थी, फिर राज्यों ने विधायकों के लिए भी अपनी-अपनी योजनाएं शुरू कीं। इस योजना ने विधायकों को विकास कार्यों के लिए सीधे स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर काम करने का मौका दिया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के रिटायर्ड राजनीति विज्ञान प्रोफेसर रजनी रंजन झा कहते हैं, “सांसद निधि योजना ने विधायक और स्थानीय प्रशासन के बीच के रिश्ते को बदल दिया — पहले जो निगरानी का रिश्ता था, वह अब साथ मिलकर काम करने का रिश्ता बन गया।”
विधायकों की आज़ादी को सीमित करने वाली एक और बात है — दलबदल विरोधी कानून, जो 1985 में 52वें संविधान संशोधन से आया। इसके तहत विधायक को अपनी पार्टी के फैसले के मुताबिक ही वोट देना पड़ता है। अगर वे अपनी ही पार्टी के मंत्री द्वारा लाए गए किसी कानून के खिलाफ वोट दें, तो उनकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है।
हेगड़े साफ कहते हैं, “विधायक अपनी पार्टी के फैसले के खिलाफ नहीं जा सकते — वरना उनकी सदस्यता चली जाएगी।”
विधायक: सरकार और जनता के बीच की कड़ी
उत्तर प्रदेश काडर के रिटायर्ड आईएएस अफसर नितिन आर. गोकर्ण इस पूरी तस्वीर को साफ-साफ समझाते हैं:
“कानून बनाना विधायक की औपचारिक ज़िम्मेदारी है। लेकिन उन्हें असली ताकत मिलती है, अनौपचारिक कामों से — सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य सेवा या पुलिस से जुड़ी स्थानीय समस्याओं को सुलझाना।”
जब बात राज्य स्तर के बड़े मामलों की हो — जैसे हाईवे, उच्च शिक्षा या बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट — तो विधायक की भूमिका एक बीच की कड़ी जैसी हो जाती है।

हिंदुस्तान टाइम्स, उत्तर प्रदेश की पूर्व एग्ज़ीक्यूटिव एडिटर सुनीता एरन कहती हैं, “विधायक अपने इलाके के लोगों और सरकार के बीच की एक कड़ी है।”
यही बीच की भूमिका विधायकों को सरकारी योजनाओं पर नज़र रखने वाला एक असरदार निगरानी रखने वाला भी बनाती है।
गोकर्ण कहते हैं, “एक अच्छा विधायक सरकारी योजनाओं की निगरानी अच्छे से कर सकता है, क्योंकि वह ज़मीन से जुड़ा होता है। वह विधानसभा या मीडिया के ज़रिए भ्रष्ट अफसरों और भ्रष्टाचार को सामने ला सकता है।”
एक सवाल यह भी उठता है — क्या विपक्ष के विधायक को भी सत्ता पक्ष के विधायक जैसी ही सुनवाई मिलती है अफसरों से?
गोकर्ण इसका संतुलित जवाब देते हैं, “आम तौर पर अधिकारी सभी विधायकों से मिलते हैं। जो मुद्दे सरकार के लिए राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील नहीं होते, उन रोज़मर्रा की योजनाओं और नीतियों से जुड़ी मांगों पर सभी विधायकों की बात ठीक से सुनी जाती है।”
यह अनौपचारिक ताकत असल में काम करती है — भले ही संविधान में इसका कोई ज़िक्र न हो।
हेगड़े सावधानी से जोड़ते हैं, “संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो प्रशासन को विधायक के निर्देश में रखता हो।”
गोकर्ण कहते हैं, “चाहे आप परिवार के मुखिया हों या विधायक, भूमिका एक जैसी ही है। आप लोगों के भरोसे के संरक्षक हैं, और अपने इलाके को दिशा देते हैं।”
चार ज़रूरी गुण
1. ईमानदारी
गोकर्ण एक दिलचस्प घटना याद करते हैं।
जब वे लोक निर्माण विभाग (PWD) में प्रिंसिपल सेक्रेटरी थे, तब एक विधायक उनके पास आए और एक सड़क प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार की शिकायत करते हुए तकनीकी जांच की मांग की। अगले हफ्ते वही विधायक फिर आए और कहा कि अब वे संतुष्ट हैं, इसलिए जांच रोक दी जाए। गोकर्ण ने मना कर दिया।
जांच में सामने आया कि काम बहुत खराब हुआ था, और विभाग ने कार्रवाई की।
गोकर्ण कहते हैं, “लेकिन उस विधायक ने मेरी नज़रों में अपनी विश्वसनीयता खो दी।”

छत्तीसगढ़ के सात बार विधायक रहे सत्यनारायण शर्मा कहते हैं, “अगर आप अफसरों का सहयोग चाहते हैं, तो उनके साथ ईमानदारी से व्यवहार करें।”
एरन इसमें मीडिया का पहलू जोड़ती हैं: “विधायक की ईमानदारी से प्रेस का भरोसा बढ़ता है। अगर एक विधायक की दी गई जानकारी बार-बार सही निकलती है, तो भरोसा और मज़बूत होता है।”
एक बार भरोसा टूट जाए, तो उसे फिर से बनाना बहुत मुश्किल होता है।
2. जनता से जुड़ाव
एरन कहती हैं, “जो विधायक बार-बार चुनाव जीतते हैं, उन सबमें एक बात समान होती है — वे आम लोगों के लिए हमेशा उपलब्ध और सुलभ होते हैं।”
इसका तरीका सीधा है: जब आप लगातार अपने लोगों के संपर्क में रहते हैं, तो आपको उनकी समस्याओं की सही जानकारी मिलती रहती है।
मध्य प्रदेश (अविभाजित) में दो बार मंत्री रहे सत्यनारायण शर्मा कहते हैं, “अगर आप अपने मतदाताओं के नियमित संपर्क में रहते हैं, तो वे आपको इलाके की सही जानकारी देते रहते हैं।”
“उनकी यह जानकारी मुझे विधानसभा में सही मुद्दे उठाने में मदद करती थी।”

3. बात सुनने का गुण
शर्मा कहते हैं, “इंसान को धैर्य से लोगों की बात सुननी चाहिए।”
“अगर कोई आपसे मिलने और बात करने की कोशिश कर रहा है, तो उसे समय दें।”
हेगड़े इसे एक ज़रूरी पेशेवर गुण मानते हैं: “अच्छे से सुनना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि विधानसभा का काम सही तरीके से करने के लिए कई लोगों से बात करनी पड़ती है।”
जो नेता लोगों की बात नहीं सुनता, वह सही मायने में उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता।
4. प्रशासन की समझ
“भले ही मंत्री आपका दोस्त हो, फिर भी आप उसे फोन करके अपने इलाके की बंद नाली साफ करवाने कहेंगे।” — संजय हेगड़े, सीनियर एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट
सही जगह पर सही व्यक्ति से बात करना — कौन सा विभाग, कौन सा अफसर, और कहां तक मामला बढ़ाना है — यही फर्क बताता है कि कौन सा विधायक काम करवा पाता है और कौन सिर्फ वादे करता है।
हेगड़े कहते हैं, “जल्दी काम करवाने के लिए विधायक को प्रशासन का ढांचा अच्छे से समझना ज़रूरी है, ताकि वक्त बर्बाद न हो।”
गोकर्ण भी इससे सहमत हैं: “सही जगह पर सही तरीके से बात करने की समझ से काम जल्दी होता है। अगर विधायक को सरकारी व्यवस्था की समझ हो, तो वह शिकायतों का जल्दी निपटारा करवा सकता है।”
मतदाता के लिए एक सूची
ये गुण मतदाताओं के लिए चार आसान पैमानों में बदले जा सकते हैं — किसी उम्मीदवार को परखने के लिए:
- पढ़ा-लिखा हो — शोध बताता है कि जब पढ़े-लिखे नेता और उनके मतदाताओं की सोच एक जैसी होती है, तो वे निवेश लाने और सुधार करने में ज़्यादा कामयाब होते हैं।
- साफ-सुथरा रिकॉर्ड हो — शोध यह भी बताता है कि जिन इलाकों से आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवार चुने जाते हैं, वहां गरीबी ज़्यादा बढ़ती है और साक्षरता घटती है।
- प्रशासन की समझ हो — सरकारी व्यवस्था की समझने वाला नेता समस्याओं का हल निकालता है, सिर्फ सुनता नहीं।
- आसानी से मिलने वाला हो — खासकर महिलाओं और कमज़ोर तबकों के लिए, ऐसा विधायक जिससे बात करना आसान हो और जिसका कोई आपराधिक इतिहास न हो, ज़्यादा काम का साबित होता है।
लोकतंत्र में हमारी ज़िंदगी की गुणवत्ता उन लोगों पर निर्भर करती है, जिन्हें हम चुनते हैं। अगर हमारे पास उम्मीदवार को परखने का कोई साफ तरीका नहीं है, तो हम सही प्रतिनिधि नहीं चुन पाएंगे।
यही सूची उन लोगों के लिए भी उतनी ही काम की है, जो खुद राजनीति में आना चाहते हैं। यह उन्हें सिर्फ यह नहीं बताती कि मतदाता क्या चाहते हैं, बल्कि यह भी बताती है कि उन्हें खुद कैसा बनना होगा।
अगली बार जब कोई उम्मीदवार आपके दरवाज़े पर आए या मंच से भाषण दे, तो खुद से पूछें — क्या वह सुनता है? क्या उसे सिस्टम की समझ है? क्या वह अपनी बात पर टिकता है?
यही एक अच्छे विधायक की पहचान है।





