कैसे पैसा और गायब विपक्ष लोकतंत्र के नियम बदल रहे हैं
“जिला अध्यक्ष ने मुझसे पूछा कि क्या मेरे पास बड़ी गाड़ी है। जब मैंने कहा नहीं, तो उन्होंने मेरा मजाक उड़ाया। बड़ी गाड़ी के बिना तुम कैसे घूमोगे? मुझे बहुत बुरा लगा और मैंने तुरंत इस्तीफा दे दिया।” बिहार के एक युवा राजनीतिक कार्यकर्ता की यह बात एक कड़वी सच्चाई बयान करती है जिसे लोग सिर्फ फुसफुसाते हैं। पैसे के बिना आप सिर्फ चुनाव नहीं हारते, बल्कि राजनीति में दाखिला ही नहीं मिलता। अब वह उसी पार्टी के लिए बाहरी व्यक्ति की तरह काम करता है। अभी नव मासिक तनख्वाह पर पार्टी के आंतरिक काम में कार्यरत है”।
हिंदी पट्टी में राजनीतिक संगठन में जगह पाने के लिए विचारधारा नहीं, बल्कि पैसे की जरूरत होती है। गाड़ियों के काफिले, होटल की व्यवस्था और राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए पैसे चाहिए। छत्तीसगढ़ के एक युवा राजनीतिक कार्यकर्ता कहते हैं, “पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान युवा टीम के हर जिला अध्यक्ष को अपने खर्चे पर तीन दिन के लिए तीन से पांच बड़ी गाड़ियों का इंतजाम करने को कहा गया। एक सामान्य कार्यकर्ता इतना पैसा कहां से लाए?” बड़ी गाड़ी सिर्फ गाड़ी नहीं है। यह राजनीतिक ताकत और पहुंच का प्रतीक है।

इस पैसे की राजनीति के कुछ अच्छे अपवाद भी हैं। जैसे सुदामा प्रसाद, जो CPI(ML) के नेता हैं और दक्षिणी बिहार में सक्रिय हैं। वे पहले विधायक बने, फिर 2024 में लोकसभा चुनाव जीते। इसी तरह आलमबदी हैं, जो आजमगढ़ के निजामाबाद से समाजवादी पार्टी के चार बार विधायक रहे हैं। वे सादा जीवन जीते हैं और राजनीति में सफल भी हैं। लेकिन ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों के नेता और सदस्य इन उदाहरणों से कुछ नहीं सीखते। वे इनसे सीखने से इनकार करते हैं।
नया राजनैतिक अभिजात्य
मंत्रियों, ठेकेदारों और बड़े सरकारी अफसरों के बेटों ने चुपचाप पुराने जुझारू राजनीतिक कार्यकर्ताओं की जगह ले ली है। यह योग्यता के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि वे दिखावे का खर्च उठा सकते हैं। रोजाना की राजनीति, जो कभी दृढ़ता और सेवा की भावना से चलती थी, अब ज़्यादा खर्चों की मांग करती है। जितनी ज़्यादा खर्च करने की क्षमता, उतनी ही पार्टी के नेताओं तक पहुंच।

इस रुझान के नतीजे बुरे हैं। इससे आर्थिक और सामाजिक असमानता बढ़ी है। अमीरों को फायदा हुआ है और भ्रष्टाचार बढ़ा है। पहले ऐसा नहीं था।
समाजवादी से पूंजीवादी भारत
जब भारत ने 90 के दशक में अपनी व्यापारिक नीतियों को ढीला किया और विश्व अर्थव्यवस्था के लिए दरवाजे खोले, तो राजनीति में पैसे के प्रवाह के लिए भी रास्ता खुल गया। 80 के दशक तक एक जिला स्तर का कार्यकर्ता राजनीतिक जान-पहचान और सामान्य साधनों पर जीवित रह सकता था। सरकारी स्कूल, स्वास्थ्य सेवा और आवास तक पहुंच रिश्तों के जरिए मिलती थी, न कि पैसे के एवज में।
1990 में भारत में हर 1000 लोगों पर 3 कारें और 15 दोपहिया वाहन रजिस्टर्ड थे। 2022 में यह संख्या बढ़कर 34 कार और 185 दोपहिया वाहन हो गई। यह दस गुना बढ़ोतरी है। कम गाड़ियों के समय में बड़े नेता जिला स्तर के कार्यकर्ताओं से गाड़ी की व्यवस्था की उम्मीद नहीं करते थे। एक कार्यकर्ता के पास गाड़ी हो, यह सोचा भी नहीं जाता था। पद के लिए यह शर्त तो बिल्कुल नहीं थी।

सरकार के उपभोग सर्वेक्षण से भारतीयों की बदलती आदतों का पता चलता है। 1988 में कुल खर्च में से एक औसत भारतीय ग्रामीण क्षेत्र में 64% और शहरी क्षेत्र में 57% सिर्फ खाने पर खर्च करता था। 2023 में यह संख्या ग्रामीण क्षेत्र में 46% और शहरी क्षेत्र में 39% हो गई। खाने की चीजों पर भी अनाज पर खर्च 43% से घटकर 14% हो गया, जबकि पैकेजिंग वाली चीजों पर खर्च 8% से बढ़कर 23% हो गया।
सीधे शब्दों में कहें तो अगर आप सामान्य किसान परिवार से थे, जो कि कई लोग थे, और आपके पास चावल-गेहूं की उपलब्धता थी, तो 1988 में आप बाकी चीजों पर कम खर्च करते थे। 2023 में बाजार की ताकतें और सामाजिक दबाव आपको खाने की चीजों के अलावा दूसरी चीजों पर भी खर्च करने को मजबूर करता है। दिखावे पर पैसे खर्च करना अब सामाजिक मजबूरी है, जो राजनीति में सक्रिय लोगों को भी करना पड़ता है। राजनीतिक कनेक्शन तभी काम के हैं जब वे इस खर्च में मदद करें।
राजनीति से कमाई
उत्तर प्रदेश या बिहार में राजनेता पारंपरिक रूप से सरकार से काम कराकर पैसा कमाते थे। पेंशन की मंजूरी, निर्माण की अनुमति या योजनाओं का फायदा। ईमानदार राजनेता मदद करते थे, बेईमान राजनेता फर्जी कंपनियों के जरिए सरकारी ठेके हथियाते थे।
बुनियादी ढांचे का खर्च, खासकर सड़कें, निजी ठेकेदारों के जरिए होता है जिनके राजनीतिक कनेक्शन अच्छे होते हैं। कई राजनेता अब ये ठेके सीधे लेते हैं। ऐसे ठेकेदार मिलना मुश्किल है जो राजनीति में सक्रिय न हों। या तो वे खुद पदाधिकारी हैं या प्रत्याशी हैं, या फिर उनके बच्चे इस काम में हैं।

लेकिन ठेकेदार-राजनेताओं के पास सार्वजनिक काम के लिए समय कम होता है। खासकर उन गरीब समुदायों के लिए जिनके पास पैसा नहीं है। नौकरशाही के साथ उनका रिश्ता व्यापारिक होता है। हर काम की कीमत होती है। वे ईमानदार राजनेताओं की तरह जान-पहचान से काम नहीं करा सकते। इससे वे आम जनता से दूर हो जाते हैं। इस कमी को वे पार्टी के बड़े नेताओं पर खर्च करके पूरा करते हैं। होटल बुकिंग, बड़ी गाड़ी की व्यवस्था और चुनाव में चंदा देकर।
लेकिन इस तरह की राजनीति के लिए लगातार सत्ता में रहना जरूरी है। पार्टी हारने पर बड़ी मुश्किल होती है।
विरोध की खोई हुई कला
सत्ता से बाहर होने पर राजनेताओं को सरकार की नाकामियों को उजागर करना चाहिए। गलत काम करने वाली नौकरशाही को शर्मिंदा करके सुधारना चाहिए। दोनों काम सक्रिय विरोध के हैं जिससे सरकार नाराज होती है। जो लोग सरकार से दोस्ती से कमाई करते हैं, उनके लिए यह नाराजगी का मतलब है धंधे में नुकसान या उसका बंद हो जाना।
ठेकेदार राजनेताओं के लिए पाला बदलना या गायब हो जाना आसान है। यह चलन इतना आम है कि रोजाना की समस्याओं के खिलाफ प्रदर्शन लगभग खत्म हो गए हैं। बिजली, पानी, जलभराव, टूटी सड़कें, स्वास्थ्य सेवा की नाकामी के खिलाफ आवाज नहीं उठती। जिला स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन न होने से लगता है कि भ्रष्टाचार नहीं है, लेकिन यह सच नहीं है। भ्रष्टाचार बना हुआ है, बस ठेकेदार राजनेता गायब हो गए हैं। उनके साथ विपक्षी पार्टियों की विपक्ष की भूमिका निभाने की क्षमता भी खत्म हो गई है।
पार्टियों को क्या करना चाहिए
अभी भी समय है। बिहार में इस साल चुनाव हैं और उत्तर प्रदेश में 2027 की शुरुआत में। विपक्षी पार्टियां, अगर वे महज दिखावे की राजनीति से ज्यादा करना चाहती हैं, तो उन्हें ठेकेदार वर्ग को बाहर करके सच्चे कार्यकर्ताओं को लाना होगा। उन्हें ऐसे नेताओं की जरूरत है जो पार्टी के लिए मेहनत करने को तैयार हों। सिर्फ दावत का इंतजाम करने के लिए नहीं।

आगे का रास्ता यह याद रखने में है कि विपक्ष का सच्चा मतलब क्या है। दिवंगत कांग्रेसी नेता वसंत साठे ने एक बार याद दिलाया था कि विपक्ष का मतलब निर्वासन नहीं है। यह पार्टी को मजबूत बनाने का मौका है। विपक्षी पार्टियों को जमीनी स्तर पर मुखर, दिखाई देने वाला, और प्रभावी विरोध खड़ा करना होगा। राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव जैसे नेताओं को खुद से पूछना होगा कि क्या वे दबे-कुचले लोगों को सम्मान की जिंदगी दिलाना चाहते हैं या फिर भ्रष्टाचार में फलने-फूलने वालों के चालक बनना चाहते हैं?





