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मोदी की चुप्पी, ट्रंप का अत्याचार और कायरता की कीमत

  • August 14, 2025
  • 1 min read
मोदी की चुप्पी, ट्रंप का अत्याचार और कायरता की कीमत

जब डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय स्टील और एल्युमिनियम के निर्यात पर 50% टैरिफ लगा दिया, तो उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका मज़बूत जवाब देंगे। लेकिन हुआ उल्टा—उनकी चुप्पी ने साफ़ कर दिया कि यह मामला राजनीतिक मजबूरी और रीढ़विहीन रवैये का है। जो कभी ट्रंप को अपना “मित्र” बताने में गर्व महसूस करते थे, वही मोदी आज अमेरिकी आर्थिक दबंगई के सामने खामोश हैं और अपने अरबपति दोस्त गौतम अडानी को बचाने में जुटे हैं, जिन पर अमेरिका में ही वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप हैं।

दोस्ती या अधीनता?

2019 में ह्यूस्टन के “हाउडी, मोदी” कार्यक्रम में मोदी ने मंच से कहा था—“अभी बार ट्रंप सरकार!” यह किसी जिम्मेदार नेता का बयान नहीं, बल्कि दूसरे देश की चुनावी राजनीति में खुला हस्तक्षेप था। यह दांव मोदी ने निजी और राजनीतिक, दोनों फायदे के लिए लगाया था, लेकिन अब वही उनके गले की फांस बन गया है। 2025 में ट्रंप फिर सत्ता में हैं और भारत को साझेदार की तरह नहीं, बल्कि सज़ा देने के लिए निशाना बना रहे हैं।

ट्रंप जहां चीन को धमका रहे हैं, ईरान पर पाबंदी लगा रहे हैं और दुनिया भर में अपने सहयोगियों को नाराज़ कर रहे हैं, वहीं उन्होंने भारत पर आर्थिक हमला कर दिया—रूस से सस्ता तेल खरीदने के लिए। और यह तब है, जब अमेरिका खुद बिचौलियों के ज़रिए यही तेल चुपचाप खरीदता है।

और मोदी? न जवाब, न प्रतिकार—बस खामोशी। इस नाकाम दोस्ती को बचाने के लिए उनका यह झुकाव साफ़ तौर पर कायरता है।

अमेरिका का दोहरा मापदंड

अमेरिका खुद यूरोपीय और अन्य बिचौलियों के ज़रिए रूस से अरबों डॉलर का माल, तेल, खाद और एल्युमिनियम खरीदता है, लेकिन भारत को उसी काम के लिए सज़ा देता है। उनके लिए नियम अलग हैं, और हमारे लिए अलग।

फिर भी मोदी इस मामले में अमेरिका को चुनौती देने के बजाय चुप हैं। नतीजा—स्टील और निर्यात क्षेत्र के लाखों मज़दूर अपनी नौकरी खोने के खतरे में हैं।

अडानी का मसला और मोदी की दुविधा

मोदी की इस चुप्पी के पीछे अडानी फैक्टर भी है। अडानी का छोटा व्यापारी से वैश्विक कारोबारी बनने का सफ़र मोदी की राजनीति के साथ-साथ बढ़ा, लेकिन अब अडानी अमेरिका में जांच के घेरे में हैं—शेल कंपनियों, शेयर बाज़ार में हेरफेर और टैक्स चोरी के आरोपों के साथ। इसके बावजूद मोदी अडानी का बचाव करते हैं, उन्हें मंच देते हैं और सरकारी फायदे भी। जाहिर है, ट्रंप के खिलाफ सख्त रुख अपनाने से इस तिकड़ी—ट्रंप, अडानी और मोदी—पर और नज़रें जातीं।

राष्ट्रीय हित या निजी अहंकार?

ट्रंप के टैरिफ के सामने मोदी की चुप्पी सिर्फ़ कूटनीतिक चूक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित से समझौता है। उन्होंने—

* ₹40,000 करोड़ का वार्षिक निर्यात दांव पर लगा दिया
* 10 लाख से ज्यादा नौकरियां खतरे में डाल दीं
* ऊर्जा संप्रभुता पर आंच आने दी
* दुनिया में भारत की सौदेबाज़ी की ताकत कम कर दी

यह सब केवल एक ऐसी दोस्ती बचाने के लिए, जिसने भारत को नुकसान ही दिया है।

सवाल तो उठेंगे

किसी मज़बूत लोकतंत्र में इस तरह की चुप्पी संसद, मीडिया और सड़कों पर गुस्से का कारण बन जाती। लेकिन मोदी के भारत में यह सब नदारद है। टीवी चैनल कनाडा और मालदीव पर तो खूब बहस करेंगे, लेकिन ट्रंप के आर्थिक हमले पर चुप रहेंगे।

सरकार की योजना कहाँ है? जवाबी कदम कहाँ हैं? और मोदी डर किससे रहे हैं?

अब झुकना नहीं, खड़ा होना होगा

दुनिया ताकत का सम्मान करती है, कमजोरी का नहीं। भारत को किसी का जागीरदार बनने की ज़रूरत नहीं है, न ही एक नेता की निजी दोस्ती के कारण देश की गरिमा और संप्रभुता गिरवी रखनी चाहिए।

अगर मोदी भारतीय मज़दूरों, किसानों और उद्योगों को विदेशी आर्थिक हमलों से नहीं बचा सकते, तो उन्हें यह कुर्सी छोड़ देनी चाहिए। ट्रंप से दोस्ती हमारी गरिमा, आत्मसम्मान और संप्रभुता की कीमत पर नहीं हो सकती।

भारत को ऐसे नेता चाहिए जो सत्ता के सामने सच बोल सकें—न कि वो जो उसके सामने सिर झुका दें।

About Author

आफ़ताब अहमद

आफ़ताब अहमद एक तकनीकी पेशेवर हैं, जिन्हें विज्ञान, इतिहास, राजनीति, विश्व मामलों और धर्म में गहरी रुचि है। वे अपनी तकनीकी विशेषज्ञता को वैश्विक और सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण के साथ जोड़ते हैं।

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