बिहार दोराहे पर: युवा आकांक्षाएँ बनाम थके हुए गठबंधन
बिहार एक राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है। इसकी युवा आबादी बेचैन है, और इसके पुराने नेता लड़खड़ा रहे हैं। जैसे-जैसे 2025 के विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, राज्य संकटग्रस्त यथास्थिति और बदलाव की मांग करती उभरती आवाज़ों के बीच फँसा हुआ है। विचारों और गतिशीलता से क्षीण भाजपा-जदयू गठबंधन, फीके पड़ते करिश्मे और सांप्रदायिकता के ढर्रे पर ही टिका हुआ है। वैचारिक मतभेदों से ग्रस्त होने के बावजूद, विपक्ष में नई ऊर्जा के संकेत दिख रहे हैं, खासकर राजद नेता तेजस्वी यादव की बढ़ती व्यक्तिगत अपील के बल पर। विपक्षी दल के अन्य नेता, जिनमें नवोदित जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर भी शामिल हैं, कैंपस में पले-बढ़े बुद्धिजीवियों से लेकर ज़मीनी रणनीतिकारों तक से ताकत हासिल कर रहे हैं। यह सिर्फ़ सत्ता की लड़ाई नहीं है, यह बिहार के अतीत का लेखा-जोखा है, इसके भविष्य को लेकर रस्साकशी है, और इस बात की परीक्षा है कि कौन सचमुच अपने लोगों की आवाज़ उठा सकता है।
यह वरिष्ठ पत्रकार और लेखक नलिन वर्मा के द एआईडीईएम में पाक्षिक कॉलम ‘एवरीथिंग अंडर द सन’ का 17वां लेख है।
“शिक्षित बनो, आंदोलन करो, संगठित हो जाओ,” बी. आर. आंबेडकर ने एक बार कहा था।
आंबेडकर का यह आह्वान ऐसे समय में आया जब भारत दोहरी गुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था—एक ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन और दूसरी हिंदू वर्णाश्रम व्यवस्था के अधीन, जिसने हाशिए पर पड़े समुदायों को ‘शूद्र’ जाति में जन्म लेने के कारण निरंतर दासता की सजा देकर उनका अमानवीयकरण किया।
जैसे-जैसे बिहार अक्टूबर/नवंबर 2025 में होने वाले विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ रहा है, राज्य खुद को संकटों के जाल में फंसा हुआ पा रहा है: अभूतपूर्व बेरोज़गारी, खेतिहर मज़दूरों का बड़े पैमाने पर पलायन, शिक्षा का चरमराता बुनियादी ढाँचा, बिगड़ती कानून-व्यवस्था और जर्जर होती शासन व्यवस्था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने पूर्व रूप की छाया मात्र प्रतीत होते हैं, और चुनाव आयोग द्वारा प्रायोजित विवादास्पद मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण ने मौजूदा भ्रम और अराजकता को और गहरा कर दिया है।
बिहार संकट के कगार पर है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जिसने नीतीश कुमार के 20 साल के कार्यकाल में ज़्यादातर समय उनके साथ सत्ता साझा की है, थकी हुई नज़र आ रही है—और घिसी-पिटी ‘हिंदू बनाम मुसलमान’ की कहानी दोहरा रही है। इस बीच, जनता दल (यूनाइटेड) नीतीश के गिरते स्वास्थ्य और नई पीढ़ी के नेताओं को तैयार करने में नाकामी के कारण कमज़ोर और कमज़ोर दिख रही है।

सुशील कुमार मोदी के बाद के दौर में—सुशील एक चतुर प्रचारक हैं और बिहार के समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था पर गहरी पकड़ रखते हैं—भाजपा के पास विश्वसनीय राज्यस्तरीय चेहरों का अभाव है। यह पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे पर निर्भर है, लेकिन 11 साल सत्ता में रहने के बाद वह भी फीका पड़ गया है। कभी स्वतःस्फूर्त भीड़ जुटाने में सक्षम मोदी की रैलियाँ अब कथित तौर पर आशा कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और कर्मचारियों को सीटें भरने के लिए सरकारी मशीनरी पर निर्भर हैं।
हालांकि, यह मान लेना नासमझी होगी कि विपक्षी दल—राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस, वामपंथी दल और नई-नवेली जन सुराज पार्टी—बिहार को इस दलदल से निकालने के लिए कोई जादुई छड़ी रखते हैं। फिर भी, आशा की एक किरण ज़रूर है। विपक्षी खेमा नए चेहरों और युवा ऊर्जा से भरा हुआ है—जैसे कीचड़ भरे पानी से खिले फूल।
विपक्ष का पुनरुत्थान:
राजद का नेतृत्व करने वाले तेजस्वी यादव ने पार्टी की छवि सुधारने के लिए कड़ी मेहनत की है। हालाँकि आलोचक उन्हें “कम पढ़ा-लिखा” कहकर उनकी खिल्ली उड़ाते हैं, लेकिन उन्होंने विद्वान-कार्यकर्ताओं को अपने दल में शामिल करने में कई लोगों को पीछे छोड़ दिया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद, प्रोफेसर मनोज झा, संसद में पार्टी के बौद्धिक विमर्श का नेतृत्व करते हैं। राजद के पास जयंत जिज्ञासु, प्रियंका भारती और कंचना यादव जैसे स्पष्टवादी और उच्च शिक्षित प्रवक्ताओं की एक सूची है। जिज्ञासु ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से पीएचडी की है, जबकि प्रियंका और कंचना वहीं पीएचडी स्कॉलर हैं—जो अक्सर राष्ट्रीय टेलीविजन और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विरोधियों के साथ ताल-मेल बिठाती रहती हैं। इसके अलावा, पार्टी में दिल्ली विश्वविद्यालय के संकाय सदस्य नवल किशोर भी हैं, जो कैंपस-स्तरीय संगठन बनाने की अपनी क्षमता के लिए जाने जाते हैं।

और प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कभी एक प्रसिद्ध राजनीतिक रणनीतिकार रहे, जिन्होंने नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार सहित प्रमुख नेताओं की चुनावी सफलताओं में अहम भूमिका निभाई, प्रशांत ने अब खुद को एक ज़मीनी राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में स्थापित कर लिया है। पिछले तीन वर्षों में, उन्होंने बिहार के कोने-कोने का दौरा किया है और राज्य के मतदाताओं के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाई है। आँकड़ों, स्पष्टता और आकर्षक संवाद शैली के बल पर, प्रशांत किशोर बिहार में एक जाना-पहचाना नाम बन गए हैं।
देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस ने भी बिहार में अपनी छवि को काफ़ी हद तक नया रूप दिया है। राहुल गांधी—जो प्रधानमंत्री और संघ परिवार के सबसे मुखर और कटु आलोचक माने जाते हैं—के नेतृत्व में पार्टी ने चुनावों से पहले कृष्णा अल्लावरु को अपना बिहार प्रभारी नियुक्त किया है। अल्लावरु एक उच्च शिक्षित और सक्षम पेशेवर हैं, जिन्होंने INSEAD, फॉनटेनब्लियू (फ़्रांस) से MBA और जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी लॉ सेंटर से LLM की डिग्री हासिल की है। युवा और ऊर्जावान, वह कर्नाटक से आते हैं और गठबंधन सहयोगियों के साथ व्यवहार करने और चुनावी रणनीति बनाने में अपने व्यावहारिक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। ख़ास बात यह है कि उन्हें राहुल गांधी का भरोसा हासिल है। इसके अलावा, पार्टी को जेएनयू से डॉक्टरेट और प्रखर वक्ता कन्हैया कुमार का भी समर्थन हासिल है, जो हिंदुत्व के कथानक को स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ ध्वस्त करने के लिए जाने जाते हैं।

इस बीच, बिहार में वामपंथ का नेतृत्व प्रतिष्ठित भारतीय सांख्यिकी संस्थान, कलकत्ता से स्नातक दीपांकर भट्टाचार्य के नेतृत्व में भाकपा-माले लिबरेशन कर रही है। हालाँकि अब युवा नहीं रहे, दीपांकर कम उम्र में ही पूर्णकालिक क्रांतिकारी बन गए थे और भाकपा-माले के भूमिगत संचालन के दौरान उसमें शामिल हो गए थे। 1990 के दशक में, जब उनकी उम्र 30 के आसपास थी, तब उन्होंने विनोद मिश्रा के बाद पार्टी महासचिव का पद संभाला था। दीपांकर को जानने वाले लोग बिहार के हाशिए पर पड़े समुदायों, लैंगिक भेदभाव, असमानता और गरीबी के बारे में उनकी व्यापक और सूक्ष्म समझ और शासन के प्रति उनके प्रगतिशील दृष्टिकोण से परिचित हैं। गरीबों, हाशिए पर पड़े लोगों और अल्पसंख्यकों के हितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अटूट है, और उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं का, व्यापक समाज में और पूरे भारत के शैक्षणिक परिसरों में, भरपूर समर्थन प्राप्त है।
एनडीए लड़खड़ाता है:
अगर भाजपा-जदयू के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए)—जिसमें चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समता पार्टी (एक कोइरी संगठन) भी शामिल है—की तुलना इंडिया ब्लॉक और जन सुराज पार्टी से करें, तो एनडीए युवा ऊर्जा, नए विचारों और भविष्य के लिए एक आशावादी दृष्टिकोण के मामले में स्पष्ट रूप से पिछड़ा हुआ दिखाई देता है। चिराग पासवान बेशक युवा हैं, लेकिन नीतीश कुमार के साथ उनका लंबे समय से चला आ रहा मनमुटाव एनडीए की एकजुटता को कमज़ोर करता है।
हालांकि, विपक्ष भी आंतरिक कलह और आपसी विरोध से ग्रस्त है। प्रशांत किशोर और तेजस्वी यादव दोनों ही एक जैसे गंभीर मुद्दे उठाते हैं—बेरोज़गारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा का खस्ताहाल बुनियादी ढाँचा, रोज़गार, उद्योग और कृषि पर प्रधानमंत्री के असफल वादे, और नीतीश कुमार की स्पष्ट कमज़ोरियों के बावजूद सत्ता पर अटूट पकड़—फिर भी वे प्रतिद्वंद्विता में उलझे रहते हैं।
प्रशांत किशोर अक्सर तेजस्वी को “नौवीं पास” कहकर उनका मज़ाक उड़ाते हैं, जिनका राजनीतिक करियर पूरी तरह से उनके पिता लालू प्रसाद यादव की बदौलत है। बदले में, राजद कार्यकर्ता प्रशांत को एक उच्च-जाति के ब्राह्मण अभिजात्य व्यक्ति के रूप में खारिज करते हैं और उन्हें “भाजपा की बी-टीम” करार देते हैं। प्रशांत व्यवस्था परिवर्तन की वकालत करते हैं और बिहार की राजनीति के पिछले 35 सालों—लालू और नीतीश, दोनों के दौर—को पिछड़ेपन और जड़ता के लक्षणों के रूप में देखते हैं।
दोनों ही खेमे यह समझने में नाकाम हैं कि तेजस्वी और प्रशांत बिहार के भविष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी अपने राजनीतिक करियर के अंतिम पड़ाव पर हैं। अलग-अलग रास्ते अपनाने के बावजूद, तेजस्वी और प्रशांत को अंततः बिहार को एनडीए के कुशासन के दलदल से बाहर निकालने के लिए एक कामकाजी रिश्ता बनाना होगा।

नीतीश और मोदी—जो अभी भी कार्यकारी पदों पर हैं—के विपरीत, हिंदी पट्टी के सबसे बड़े जननेता लालू प्रसाद यादव ने जानबूझकर एक औपचारिक भूमिका में कदम रखा है, जिससे तेजस्वी और युवा पीढ़ी के लिए जगह बन गई है। हालाँकि, लालू के विशाल अनुभव, भगवा राजनीति का मुकाबला करने की उनकी बेजोड़ क्षमता और बिहार के सामाजिक ताने-बाने व व्यापक हिंदी पट्टी की उनकी गहरी समझ को नज़रअंदाज़ करना नासमझी होगी। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने से दूर, लालू को आज विपक्ष के लिए एक मार्गदर्शक, एक रणनीतिकार और एक नैतिक दिशासूचक के रूप में देखा जाना चाहिए—न कि मोदी या नीतीश के प्रतिद्वंद्वी के रूप में।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगर विपक्ष अपने घर को व्यवस्थित कर ले, तो बिहार में एनडीए की उपस्थिति में भारी कमी आ सकती है। लेकिन इस मोड़ पर प्रशांत-तेजस्वी गठबंधन की उम्मीद करना ख़्वाहिशमंदी है। अधिक संभावना यह है कि 2025 का चुनाव इन युवा नेताओं को बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभारेगा, जबकि राज्य में हिंदुत्व-आधारित एनडीए शासन के प्रभुत्व को काफी हद तक कम कर देगा।
अनुवाद: रुचिका त्रिपाठी



