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सदानंद शाही ने ‘संगतराश’ पर चर्चा की

  • December 12, 2025
  • 1 min read
सदानंद शाही ने ‘संगतराश’ पर चर्चा की

यह बुक बैठक इंटरव्यू का पूरा हिंदी ट्रांसक्रिप्ट है, जिसमें लेखक सदानंद शाही के साथ हम उनके नए कविता कलेक्शन, “संगतराश” पर चर्चा कर रहे हैं, जो समय, समाज और इंसानी अनुभव की एक सोची-समझी खोज है। वाराणसी के लंका में का: द आर्ट कैफ़े में गौरव तिवारी द्वारा होस्ट किया गया यह सेशन, मतलब की साहित्यिक बातचीत के लिए पाठकों और विचारकों को एक साथ लाता है।

 

गौरव तिवारी: बुक बैठक श्रृंखला की नौवीं बैठक में आप सबका स्वागत है। आज हम लोग बात करेंगे लेखक और कवि सदानंद शाही जी से उनके नए कविता‑संकलन संगतराश पर। सर, स्वागत है आपका।

सदानंद शाही: धन्यवाद।

गौरव तिवारी: सर, शुरुआत इससे करेंगे कि आपकी कविता लिखने की शुरुआत कैसे हुई और पहली कविता जो आपने लिखी, वो किन परिस्थितियों में लिखी थी।

सदानंद शाही: देखिए, एक तो मैं विधिवत कवि नहीं हूं, लेकिन कविताएं लिखता हूं।

पहली कविता का एक बहुत मजेदार प्रसंग है। तब मुझे मालूम भी नहीं था कि जो लिख रहा हूं, वह कविता है। हम लोग संयुक्त परिवार में रहते थे। हमारे चाचा जी थे, और वे बहुत ही दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति थे—जिसे कहते हैं मानव द्वेषी। वे हमारे जीवन के एक महत्वपूर्ण चरित्र रहे हैं, जिन्होंने हमें काफी नकारात्मक ढंग से प्रभावित किया।

वे हमेशा बहाने खोजा करते थे बच्चों को मारने के लिए और बहुत क्रूरता पूर्वक मारते थे।

एक बार मैं अपने ननिहाल में था, गर्मी की छुट्टियों में। हम लोग चाचा जी का मजाक बना रहे थे। मजाक बनाते‑बनाते हमने तीन‑चार पंक्तियां लिखीं, जो तुकबंदी जैसी थीं।

हमारे एक ममेरे भाई थे, जिनकी लिखावट बहुत अच्छी थी। उन्होंने उस तुकबंदी को पोस्टर बना कर दीवार पर टांग दिया। अगले दिन चाचा जी ननिहाल आ गए। रिश्तेदारी में थे, तो मारपीट नहीं कर सकते थे। धीरे से उन्होंने मुझसे पूछा—‘ये तुमने लिखा है?’ मैंने कहा—‘नहीं, ये तो भाई ने लिखा है।’ उन्होंने कहा—‘नहीं, लिखावट उसकी है, लेकिन लिखा तुम्हारा है।’

उसके बाद हमने इस पर ज्यादा बात नहीं की। लेकिन हुआ यह कि चाचा जी ने मारपीट करना छोड़ दिया।

तब मुझे लगा कि शब्दों से खेलने की यह प्रक्रिया बहुत फलदायी है। उस समय हमारी उम्र रही होगी लगभग 11–12 साल। यही पहली घटना याद आती है कि कविता जैसी कोई चीज हमने लिखी थी, जो कहीं छपी नहीं, सिवाय उस पोस्टर के।

गौरव तिवारी: हां तो सर, मतलब आपकी कविता लिखने की प्रेरणा तो क्रूरता से शुरू हुई—क्रूरता के प्रतिकार से। अब इस नए कविता‑संग्रह के बारे में बताइए। इसमें किस तरह की कविताएं हैं?

सदानंद शाही: एक तो मैं यह कह दूं कि इस संग्रह का पूरा नाम थोड़ा लंबा है—संगतराश और जो बनारस की एक पवित्र सुबह अदृश्य होने से पहले मौजूद था

इस संग्रह में भी एक खास तरह की क्रूरता का मनोविज्ञान काम कर रहा है। जब मैं बनारस आया, उस समय हवा में एक बात थी। बनारस के एक मूर्ति‑शिल्पी गायब हो गए थे। वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के दृश्य कला संकाय के उस समय डीन थे। देश ही नहीं, दुनिया में मूर्ति‑शिल्पी के रूप में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। वे अचानक गायब हो गए और उनका कुछ पता नहीं चला—ना उनके मरने की खबर आई।

मुझे लगता है कि बनारस शहर के कई रूप हैं। हम इसे सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जानते हैं। यह बहुत पुराना शहर है और कहा जाता है कि दुनिया का सबसे पुराना जीवित शहर है। लेकिन इसके भीतर भी कई तरह की क्रूरताएं दिखाई पड़ती हैं।

हम अक्सर उसकी सांस्कृतिक छवि को देखते हैं—कुछ बनाई गई है, कुछ वास्तविक भी है। लेकिन बनारस के भीतर जो क्रूरताएं हैं, उन पर हमारी निगाह कम जाती है।

इस संग्रह की पहली कविता, जिस पर इसका नाम रखा गया है—संगतराश और जो बनारस की एक पवित्र सुबह अदृश्य होने से पहले मौजूद था—वह एक जीता‑जागता आदमी था, जो मौजूद था और फिर गायब हो गया।

ऐसी संस्कृति, ऐसा शहर—अपनी सांस्कृतिक गरिमा, वैभव और प्रसिद्धि के साथ पूरी दुनिया में चर्चा में है। लेकिन उसके भीतर देखें तो हिंसक क्रूरताएं मौजूद हैं, जिन पर हमारा ध्यान नहीं जाता। उनकी छवियां आपको इस संग्रह की कविताओं में दिखाई पड़ेंगी।

गौरव तिवारी: सर, लिखने के क्रम में आपको क्या लगता है—गद्य लेखन और कविता लिखने में, तथा सामान्य कहानी‑किताबें पढ़ने में—मुख्य फर्क क्या रहता है? एक पाठक के रूप में भी, लिखने और पढ़ने में क्या अंतर दिखाई देता है? यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि दो‑तीन सौ साल पहले अगर हम देखें, तो यहां जो भी साहित्य बनाया जा रहा था, वह सब कविता के माध्यम से ही रचा जा रहा था। लेकिन आज के दौर में हम देखते हैं कि यह उलट गया है। कविताओं की जगह गद्य ने ले ली है।

सदानंद शाही: बिल्कुल ठीक आपने ऑब्ज़र्व किया है कि हमारे देश में हाल‑हाल तक गद्य था ही नहीं। गद्य का होना बहुत हाल की घटना है।

ज्ञान की अलग‑अलग शाखाओं की किताबें भी कविता के रूप में ही लिखी जाती थीं। यानी आयुर्वेद की किताबें भी आपको कविता में मिलेंगी, वैद्यक विज्ञान की किताबें भी कविता में मिलेंगी, और नीति‑कानून की किताबें भी।

मुख्य रूप से देखें तो गद्य में एक विचार‑परखता होती है। जीवन के घमासान जैसे‑जैसे बढ़ते गए, वैसे‑वैसे ही गद्य का अवतरण हुआ। खासतौर से हिंदी की बात करें तो 18वीं–19वीं शताब्दी में, स्वाधीनता आंदोलन और उससे पहले भारत की पहचान को लेकर जो विचार शुरू हुआ, उसके लिए गद्य का विकास हुआ।

कविता मुख्य रूप से जीवन‑यथार्थ पर एक भावात्मक प्रतिक्रिया होती है। कविता को मनुष्यता की मातृभाषा कहा गया है। मनुष्य ने अपने दुख, अपनी वेदना, अपने आनंद और अपनी अनुभूतियों को संगीत और कविता के माध्यम से व्यक्त करना शुरू किया। जब तक जीवन में सरलता रही, कविता से काम चलता रहा।

लेकिन जब जीवन के घमासान बढ़े और विचारों की जरूरत पड़ी—ऐसा नहीं है कि कविताओं में विचार नहीं होते, कविताओं में विचार हैं—लेकिन उन्हें तफसील से समझाने और बड़े समूह तक पहुंचाने की जरूरत महसूस हुई। उसी के साथ गद्य का विकास हुआ।

गद्य में एक खास तरह की तीव्रता होती है। केवल वैचारिक गद्य ही नहीं, बल्कि कथात्मक गद्य भी लिखा गया। गद्य रचनाओं ने महाकाव्य और काव्य को पीछे धकेलते हुए उपन्यास और कहानियों को जन्म दिया। इनकी भी एक परंपरा हमारे यहां रही है।

कहानियों में जीवन के बड़े वृत्त को समेटने और व्यक्त करने की क्षमता थी। लेकिन कविता की जो भावनात्मक प्रतिक्रिया है, वह अब भी बनी हुई है।

कुल मिलाकर, हमारे समाज में और दुनिया भर में कविता को लेकर एक विशेष भाव बना हुआ है। हमारे समाज में आज भी कविताएं लिखी जा रही हैं—और अच्छी कविताएं लिखी जा रही हैं।

गौरव तिवारी: इसके साथ, सर, फिर आपसे अनुरोध करेंगे कि अपनी संग्रहण से एक कविता सुनाएं।

सदानंद शाही: एक कविता है—रहम कीजिए

जिन्होंने कभी किसी से प्रेम नहीं किया, उन पर रहम कीजिए।
जिन्होंने कभी किसी से प्रेम नहीं किया, उन पर रहम कीजिए।
रहम उन पर भी कीजिए जिन्हें किसी का प्रेम नहीं मिला।

प्रेम की दुनिया में जिनका दाखिला ही नहीं हुआ, जो नहीं जान सके—
फूल पर कुर्बान होने से भंवरे को क्या मिलता है।
जो नहीं जान सके हराती हुई समंदर की ओर भागती नदियों का दर्द,
उन पर रहम कीजिए।

जिन तक नहीं पहुंचती फूलों की खुशबू,
जिन्हें नहीं सुनाई पड़ती आसमान में उड़ती चिड़िया की आवाज,
खरगोश की मखमली छुवन से जो नहीं होते रोमांचित।
जिन्हें कलियों का खिलना नहीं दिखाई देता,
जो नहीं जानते कोहरे का स्वाद—
उन्हें रहम की सख्त जरूरत है।

जिन्होंने अपने से बेहतर कोई दूसरी शक्ल देखी ही नहीं,
जो नहीं निकल पाए अपनी आवाज के जादू से बाहर—
उनकी गरीबी पर रहम कीजिए।

थोड़ा‑थोड़ा खुद पर, थोड़ा‑थोड़ा इस दुनिया पर रहम कीजिए।
इस दुनिया को रहम की सख्त जरूरत है।

जितने शहनशाह हैं, जो इस दुनिया के बादशाह हैं,
जिन्हें अपनी भूख से बड़ी भूख दिखाई नहीं देती—
वे सब के सब रहम के तलबगार हैं।
उन पर रहम कीजिए।

गौरव तिवारी: हिंदी कविता के वर्तमान परिदृष्य को आप कैसे देखते हैं? क्या कोई नया आंदोलन या प्रवृत्ति हिंदी कविता में उभर रही है? मेरा आशय यह है कि किस तरह की कविताएं लिखी जा रही हैं, और किस तरह की कविताएं आजकल ज्यादा लोकप्रिय हो रही हैं—जिन्हें लोग सुनना पसंद करते हैं।

सदानंद शाही: यह हुआ है कि पिछले बीस–पच्चीस वर्षों में जो सामाजिक परिवर्तन हुआ है, उसका एक नतीजा हमें यह दिखाई पड़ रहा है कि पहले आंदोलनबद्ध कविताएं लिखी जाती थीं—किसी विचार से जुड़कर। वह जमाना अब एक तरह से पीछे छूट गया है।

नई कविताएं जो लिखी जा रही हैं, और नई पीढ़ी जो लिख रही है, उसमें जीवन के यथार्थ को खुली आंखों से देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। इसे आंदोलन तो नहीं कह सकते, हालांकि हिंदी कविता का इतिहास आंदोलनों का ही इतिहास रहा है। हिंदी समाज बहुत सारी जटिलताओं से बना हुआ है, और ऐसे समाज को समय‑समय पर सांस्कृतिक जागरण की जरूरत पड़ती है।

हमारी सभ्यता बहुत पुरानी है—जैसे कोई पुराना घर हो। चाहे जितना आलीशान हो, उसमें समय‑समय पर मरम्मत की जरूरत पड़ती है। खिड़कियां खोलनी पड़ती हैं, दरवाजे बदलने पड़ते हैं। यही स्थिति हमारे समाज की भी है। हम दावा करते हैं, और काफी हद तक सही भी है, कि हम पाँच हजार साल पुरानी सभ्यता हैं। ऐसे समाज की कविता में समय‑समय पर आंदोलन की अनुभूति सुनाई पड़ती है और पड़नी भी चाहिए।

इसी बनारस में कबीर और रैदास जैसे कवि आए। उन्होंने हिंदी कविता को बहुत व्यापक जमीन दी। लंबे समय तक भक्ति आंदोलन ने कविता को दिशा दी। भक्ति आंदोलन ने क्या किया? जब समाज पुराना हो जाता है और उसकी संरचनाएं जड़ हो जाती हैं, तो मनुष्य की हैसियत कम हो जाती है। कविता वही करती है—मनुष्य की हैसियत को दोबारा बहाल करती है।

कृतकाल का नारा ही था: ‘सबर ऊपर मानुष आ की छु, ना मनुष्य सबसे बड़ा है, उससे बड़ी और कोई चीज नहीं।’ कबीर, रैदास और अन्य कवियों ने मिलकर कविता में एक आंदोलन खड़ा किया। बाद में प्रगतिशील आंदोलन आया, जिसने भी एक समावेशी स्वरूप दिखाया।

लेकिन पिछले बीस–तीस सालों में हमारे समाज की संरचना में नया बदलाव आया है। उपभोक्तावाद बढ़ा है, तकनीक और यांत्रिकी का जीवन में दखल बहुत बढ़ गया है। इस नई अर्थरचना और चमक‑दमक के सामने मनुष्य की सत्ता फिर छोटी हो गई है।

इसलिए हिंदी में एक नए तरह के काव्य आंदोलन की जरूरत है। हालांकि ऐसा आंदोलन सोच‑समझकर चलाया नहीं जा सकता। लेकिन जो नए कवि आ रहे हैं, उनकी कविताओं में एक नई दृष्टि दिखाई दे रही है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि उसके गर्भ से कोई नया आंदोलनात्मक स्वरूप पैदा होगा—और वह दोबारा मनुष्य को प्रतिष्ठित करेगा।

गौरव तिवारी: जो लोग कविता लिखना शुरू करना चाहते हैं, लेकिन उनके अंदर हिचक है—तो उनको आपकी क्या सलाह होगी? क्या कोई ऐसा अभ्यास है जिसने आपकी मदद की? या कोई ऐसी पुस्तक, जिसने आपको कविता लिखने में सहारा दिया?

सदानंद शाही: आपके इस प्रश्न से सहसा मुझे 12वीं शताब्दी के कवि अब्दुल रहमान की याद आ रही है। वे अपभ्रंश भाषा के कवि थे। उन्होंने कहा था कि जिसके पास जितनी काव्य‑क्षमता है, उसके हिसाब से उसे कविता लिखनी या कहनी चाहिए। उस समय लिखने का विधान नहीं था—कविता कही जाती थी। उन्होंने कहा कि संकोच नहीं करना चाहिए।

इसके बाद उन्होंने जो तर्क दिए, वे बहुत महत्वपूर्ण हैं। मैं तो कहता हूं कि हिंदी कविता में साधारण के पक्ष में इतनी मजबूत ढंग से बात रखने वाला वह पहला कवि था। उन्होंने कहा—यदि ब्रह्मा कविता लिखते हैं, तो बाकी लोग क्यों न लिखें? अगर तीनों लोकों में गंगा बहती है, तो क्या बाकी नदियां न बहें? अगर तालाब में कमल का फूल खिलता है और सुंदर लगता है, तो क्या गरीब आदमी की झोपड़ी पर चढ़ी लौकी की लता का फूल न खिले?

यानी कविता लिखने की यही बात है। भाषा मनुष्य के लिए एक विशेषता है। और आज के समय में सबसे बड़ा संकट भाषा का ही है। हिंदी भाषा के इतिहास में सामाजिक विमर्श में जो हिंदी इस्तेमाल की जा रही है, उतना दूर शायद कभी नहीं गई थी।

कविता क्या करती है? कविता भाषा की खेती करती है। भाषा को उसके सुंदर रूप में लाती है। इसलिए जिसके पास जितनी क्षमता है, उसे कविता लिखनी चाहिए। भाषा की उदातता, श्रेष्ठता और सहजता बनाए रखने में योगदान करना चाहिए। क्योंकि प्रकृति ने केवल मनुष्य को ही भाषा दी है।

भाषा जितनी उदात होगी, हमारी मनुष्यता उतनी ही स्थापित और मजबूत होगी। इसलिए जो नए कवि लिख रहे हैं, उन्हें बिना हिचक लिखना चाहिए।

साथ ही जरूरी है कि वे इतिहास में लिखी गई कविताएं पढ़ें—हमसे पहले के कवि, हमारे साथ के कवि, और हमारे बाद के कवि। यही तरीका है। जैसे तैरना सीखने के लिए पानी में उतरना पड़ता है, वैसे ही लिखने की दुनिया में आए बिना बाहर से कोई तकनीक सीखकर कवि नहीं बना जा सकता।

गौरव तिवारी: ऐसे ही बात के क्रम में एक बात और जोड़ना चाहेंगे—आज के दौर में भाषा पर एक बहुत बड़ा संकट एआई का भी है।

प्रकृति ने बाकी जानवरों के मुकाबले मानव को भाषा दी थी, लेकिन अब मानव ने वही भाषा एआई को भी दे दी है। यह एआई का एक वास्तविकता में बहुत बड़ा संकट है, जिस पर बहुत सारे लोग ध्यान नहीं देते और जिसके बारे में बात भी नहीं करते।

सदानंद शाही: देखिए, सभ्यतागत संकट की बात हमने पहले भी की थी। मनुष्य के रूप में हमें बुद्धि मिली है, भाषा मिली है, और उसके साथ दो हाथ‑पैर—कर्मेंद्रियां। सभ्यता का विकास इस तरह हुआ कि हमने शारीरिक और भौतिक सुख की खोज में अपनी यात्रा शुरू की।

इस यात्रा में हमने अपनी बहुत सारी स्वतंत्रता मशीनों के हवाले कर दी और शारीरिक श्रम के महत्व को भुलाते चले गए, उसे पीछे करते चले गए। यह बहुत खतरनाक है। भारतीय समाज की सबसे बड़ी दिक्कतों में से एक यही है कि शारीरिक श्रम को हीन समझा जाता है।

उस श्रम से बचने के लिए हम जो उपाय खोजते हैं, कई बार वही उपाय मनुष्यता के सामने संकट बनकर खड़े हो जाते हैं। सभ्यता की विकास यात्रा में ‘विकास’ शब्द ही बहुत खतरनाक और व्यर्थ हो गया है।

हमारे हिंदी के पुरखे रचनाकार भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो’ यह प्रश्न उठाया था। उन्होंने कहा था कि थोड़े समय के लिए हमें ‘विकास’ शब्द का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यह निरर्थक और भ्रामक बन गया है।

कविता यही काम करती है—एक ऐसा शब्द जो अति‑प्रयोग या गलत प्रयोग से चुक गया हो, उसका नया विन्यास करके नए अर्थ पैदा करती है।

गौरव तिवारी: तो सर, अंत में मेरी इस संग्रह से जो मेरी एक पसंदीदा कविता है—मझली मामी—उसका पाठ करने का अनुरोध करूंगा।

सदानंद शाही: मेरा ख्याल है कि इस संग्रह में कुछ कविताएं बहुत लंबी हैं। उनमें से यह दूसरी सबसे लंबी कविता है। अगर धैर्य है सुनने का, तो मैं पढ़ता हूं।

मझली मामी

वे जब ब्याह कर आई थीं, तब हम छोटे बच्चे थे।
वे बेहद खूबसूरत थीं—इतनी कि उस बचपन में वे हमें मैदे की लोई जैसी लगतीं।
गोरी, चिट्टी और मुलायम—छू दो तो मैली हो जाए।
बाद में समझ में आया कि नहीं, वे ताजे सेब जैसी थीं—छू दो तो रस निकल आए।

वे पढ़ी‑लिखी नहीं थीं, सहराती भी नहीं थीं।
हमारी तब की दुनिया में सहराती औरतें थीं ही नहीं।
लेकिन अपनी देहाती ध्वज में वे यूं चलतीं, जैसे सीधे पल्ले की साड़ी पहने चांद उतर आया हो।
उनके सौंदर्य की सहजता से हम सब अभिभूत थे।

इसी बीच उन्होंने एक‑एक कर चार बच्चों को जन्म दिया—दो बेटे, दो बेटियां।
उनके सौंदर्य की आभा में चलता रहा ननिहाल का जीवन।
लेकिन उनका अपना जीवन जैसा बीता, उसे बहुत अच्छा नहीं कह सकते।
पति अपनी असफल आकांक्षाओं के दाग शराब से धोने लगे।
खेत बिके, मान‑सम्मान बिका, मनहूसियत ने घर में घर कर लिया।
वे उन बातों के लिए ताने सुनती रहीं जिनसे उनका कोई वास्ता नहीं था।
सब देखती रहीं, सब सुनती रहीं, सब बीतता रहा—सब बीतने दिया।

बहुत कोशिश की कि पति सुधर जाए, शराब छोड़ दें।
चुपके‑चुपके ओझा, झाड़‑फूंक, दवा सब करती रहीं।
वे कोई पूजा‑पाठी नहीं थीं, लेकिन उनके भी अपने भगवान थे जिनसे वे सुख‑दुख बतियातीं।
कहतीं—बस यह पहले जैसा हो जाए।
लेकिन सब बेकार।

आखिर एक दिन आया जब पति ने शराब छोड़ दी—पर बहुत देर से।
बड़े बेटे ने वही रास्ता पकड़ लिया।
जहरीली शराब ने एक दिन उसके गोरे शरीर को नीला और ठंडा कर दिया।
फिर छोटा बेटा भी उसी राह पर चला और जल्दी ही उसका भी वही अंजाम हुआ।
इस तरह उजड़ती गई उनकी दुनिया और वे इस उजाड़ की गवाह बनी रहीं।

लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी यह बीहड़ उजाड़ उनके सौंदर्य को नहीं उजाड़ पाया।
उनके नितांत खाली हाथों और खाली जीवन में एक सरल मुस्कान बची रही।
सौंदर्य की मध्यम रोशनी बिखेरती वही मुस्कान, जिससे वे सभी अभाव और विपत्तियों का सामना करती रहीं।
एक बार मैंने उनसे कहा था—‘जितनी सुंदर हैं आप, उतनी ही सुंदर है आपकी मुस्कान भी।’
उनके चेहरे पर उतर आई करुण मुस्कान और दीर्घ निश्वास के साथ उनका वाक्य—‘भाग्य नहीं था।’

विपत्तियों का सिलसिला थमा नहीं, उनकी मुस्कान भी कम नहीं हुई।
फिर एक दिन उनकी जुबान पर एक पुंसी निकली और देखते‑देखते कैंसर में बदल गई।
इलाज शुरू हुआ—लगातार कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी।
दर्द का इलाज, इलाज का दर्द।
बीमारी आखिरी स्टेज पर पहुंच गई।

कहते हैं, एक रात वे चुपके से उठीं और देर तक ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी होकर काजल लगाती रहीं।
अपनी सुंदर आंखों को काजल से सजाना उन्हें बेहद पसंद था।
वे आखिरी सांस तक काजल लगाती रहीं।
पानी और काजल के अलावा कोई सौंदर्य प्रसाधन उनके पास नहीं था—और जरूरत भी नहीं थी।

मृत्यु तेजी से करीब आ रही थी।
चेहरा काला पड़ गया था।
सारे जीवन का काजल चेहरे में उतर आया था।
पहले उनके चेहरे से सुंदरता गई, फिर वे गईं।

जब वे गईं, उनके बिस्तर पर दो ही चीजें छूट गईं—
एक छोटा सा कजरौटा और एक करुण मुस्कान।

जब वे अंतिम यात्रा के लिए छोटी गंडक के किनारे ले जाई गईं,
साथ‑साथ चली जा रही थी वह करुण मुस्कान।

उनके मृत्यु‑भोज के लिए सफेद कागज पर शोक संदेश मिला।
तब जाकर मालूम हुआ—जिन्हें हम मजली मामी नाम से जानते आए हैं,
उनका असली नाम प्रीतिबाला था।


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