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छठ महापर्व: परंपरा, प्रतिरोध और पहचान

  • October 27, 2025
  • 1 min read
छठ महापर्व: परंपरा, प्रतिरोध और पहचान

नहाय-खाय के साथ आज (25 अक्टूबर, 2025) से छठ महापर्व शुरू हो गया। 26 अक्टूबर को खरना, 27 को अस्ताचलगामी सूर्य  को शाम का अर्घ्य दिया जायेगा, और 28 अक्टूबर को उदीयमान सूर्य को प्रात:कालीन अर्घ्य दिया जाना है।

“कांच ही बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाय

बहंगी लचकत जाय

होई ना बलम जी कहरिया बहंगी घाटे पहुंचाय

बहंगी घाटे पहुंचाय।

कांच ही बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाय

बहंगी लचकत जाय

बाट जे पूछेला बटोहिया बहंगी

केकरा के जाय

बहंगी केकरा के जाय

तू तो आन्हर होवे रे बटोहिया बहंगी छठ मैया के जाय

बहंगी छठ मैया के जाय

ओहरे जे बारी छठि मैया बहंगी उनका के जाय

बहंगी उनका के जाय ..”

‘कांचहीं बांस के बहंगिया….’ या ‘केरवा जे फरेला गवध से ..’, इन तमाम छठ गीतों में  जन जीवन की समस्याओं और बेचैनी के नीचे सुस्पष्ट लकीर खिंची होती है और  ‘गण’ को पूरी अर्थवत्ता में स्वर मिलता है। ऐसा स्वर जो संकीर्ण राष्ट्रवाद और मायावी भूमण्डलीकरण से भी टकराता है ।  इससे जो निकलता है वही हमारी अस्मिता है,भारत है। मोदी जी का   ‘न्यू इंडिया’ नहीं। छठ अपने पूरे सांस्कृतिक गठन में अभिजन आडंबरों, कर्मकांडों, प्रतिगामी संस्कारों, और सामंती दुराग्रहों से भी मुठभेड़ करता महापर्व है।

छठ जातीय (कौमी) सांस्कृतिक दुनिया का नागरिक होना और  आवारा पूंजी, मिश्रित, नकली राष्ट्रीयता के गठजोड़ को टक्कर भी देना या नही यह फैसला तो बिहार इस विधानसभा चुनाव 14 नवंबर  को ही देगा। जो किसान आंदोलन के प्रणेता स्वामी सहजानन्द, महात्मा गांधी, और घुमक्कड़ दार्शनिक राहुल सांस्कृत्यायन की कर्मभूमि रहा है ।

बौद्ध-जैन सम्प्रदाय की ही नहीं बल्कि पूरे लोकायत दर्शन के विकास यात्रा की भी भूमि रहा है बिहार।   इसीलिए कठमुल्ला सनातनियों ने यहां के मगह (मगध) और गया को कमतर या निम्न कोटि का तीर्थ माना।

।“मगह गयादिक तीरथ जैसे ..”। बिहार के साधारण जन में भी भारती (मंडन मिश्र की पत्नी) की तर्कशीलता है जिन्होंने शास्त्रार्थ में आद्य शंकराचार्य को पराजित किया। बिहार यथास्थितिवादी नहीं है।

छठ में सभी संस्कृतियों का समावेश और एक मध्यम मार्ग है जहां पौराणिक देवताओं से अलग ऊर्जा के अक्षय स्त्रोत सूर्य की आराधना होती है जो प्रत्यक्ष नारायण हैं । दुनिया के तमाम मजहबों और राष्ट्रों में अलग-अलग ढंग से सूर्य आज भी उनकी आस्था है। इसीलिए सूर्य को आत्मा और चंद्रमा को मन माना जाता है।

इस पर ‘जय श्रीराम’ का ग्रहण नहीं लगने देना है ।

ऊग-ऊग हे सूरुजदेव…

हम नव प्रभात के लिए प्रतीक्षारत हैं।

 

बिहारियों को सलाम। जिस धरती से स्वप्न, कामना, विजन और क्रांति के कोलाज का छठ जैसा महापर्व उठा।  जगा। जिसमें वह सम्पूर्णता है जो समझौता नहीं करती न ही शास्रीय , पौराणिक, सैद्धांतिक फर्मे में खुद को दूषित करती है  । जिसमें भक्ति आंदोलन का भी स्वर गुंथा हुआ है ।

पहले ही लिख चुका हूं कि छठ प्रकृति के लिए गहरी चेतना से निकला करुणा का महापर्व है  । छठ में ध्यान से देंखे तो  हमारी जिजीविषा का प्रिज्म जैसा विकिरण , ओस की बूंद सा युगीन सच और वह खनखनाता  सौंदर्य है जो अभिजन जीवन प्रणाली और वर्णाश्रम विभाजन से टकराता है । छठ लोकमानस का महापर्व है।

नदियां जल समृद्ध हों , फसल भरपूर हो , वनस्पतियां फलें – फूलें , धरती पर हरीतिमा हो , ऊर्जा के अनन्त और अक्षय स्रोत सूर्य की दीप्ति बनी रहे चंद्रमा का मधु कलश भरा रहे , छठ इस कामना का पर्व है । यह हमारी अस्मिता का पर्व है  इसलिए भारत का पर्व है । न्यू इंडिया का नहीं ।  अडानी – अंबानी का नहीं।

सूर्य में आस्था के लिए  हिंदू ही होना जरूरी नहीं है । मनुवादी या ब्राह्मणवादी तो एकदम नहीं , जो व्यवस्था संघ परिवार और भाजपा  लाना चाह रही  है ।  संविधान की जगह  मनुसंहिता।

जैन धर्म में सूर्य को एक देवता माना जाता है, जिसके पास धर्मचक्र होता है । जैन अनुयायी सूर्य चक्र के सामने ध्यान करते हैं  । जापानी पौराणिक कथाओं के अनुसार, ‘अमातेरसु ओमीकामी’ एक सूर्य देवी हैं जिनकी हजारों सालों से पूजा होती रही है  ।  मिस्र में, सूर्य को  ‘रा ‘ और ‘होरुस ‘ के नाम से जाना जाता था और इसे सृष्टिकर्ता माना जाता था  ।   मेसो-अमेरिका की प्राचीन सभ्यताओं में, जैसे कि एज्टेक लोगों ने सूर्य को जीवन और फसलों का रखवाला माना था । सोल इन्विक्टस के पंथ ने रोम में सूर्य की पूजा को बढ़ावा दिया ।   ईसाई धर्म में  सूर्य प्रतीकात्मक रूप में है  लेकिन उसे सीधे नहीं पूजा  करते।

सोचिये बिहारी कितना अग्रगामी और  प्रगतिशील होता है ।  हम यूपी वाले  अवतारों   और महाकाव्यात्मक  नायकों में उलझे पड़े हैं और  अयोध्या को युद्ध की लंका बना दिया ।  भगवान राम को भाजपा का चुनावी चेहरा — जो राम को लाये हैं,  हम उनको लाएंगे।

बिहार सूर्य को देख रहा है

मैं गा रहा हूं —

उग हे सूरज देव भइले अरघ के बेरिया

 

About Author

राघवेन्द्र दुबे

तीन दशकों से अधिक समय तक विभिन्न राज्यों और प्रकाशनों में सक्रिय हिंदी पत्रकारिता के अनुभव के साथ, राघवेन्द्र दुबे भारत के राजनीतिक, सिनेमाई और सांस्कृतिक परिदृश्य को गहरी संवेदनशीलता और पैनी नज़र से देखा है। आज उनका जीवन सूत्र है – “ज़िंदगी से इश्क़ करो” ताकि भरपूर जिया जाए और पूरे जुनून से लिखा जाए। राजनीति, फ़िल्मों और संस्कृति के प्रति उनका अटूट प्रेम आज भी उनकी लेखनी को आकार देता है और उन्हें पाठकों से जोड़े रखता है

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