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कैसे एक व्हाट्सऐप अफ़वाह ने बारामूला के निवासियों को छोड़ा टूटी हड्डियों और खाली जेबों के साथ

  • August 30, 2025
  • 1 min read
कैसे एक व्हाट्सऐप अफ़वाह ने बारामूला के निवासियों को छोड़ा टूटी हड्डियों और खाली जेबों के साथ

2019 के अंत में, पीर पंजाल पर्वतमाला के गाँवों में एक अजीब अफ़वाह फैलनी शुरू हुई।

व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड्स में दावा किया गया कि जब बिजली गिरती है तो वह पीछे दुर्लभ “आसमान के पत्थर” छोड़ जाती है, जिनकी कीमत लाखों में होती है—कभी-कभी तो एक पत्थर के 50 लाख रुपये तक चीनी ख़रीदार चुकाते हैं।

ये संदेश धुंधले वीडियो, वॉइस नोट्स और चमकते पत्थरों की तस्वीरों के साथ आते थे, जिनमें अक्सर नाटकीय संगीत और यह कैप्शन होता कि इसमें नासा (National Aeronautics and Space Administration) या चीन शामिल है।

“यह सुनने में विज्ञान जैसा लगता था, लेकिन यह पूरी तरह बकवास था,” 34 वर्षीय विज्ञान शिक्षक बिलाल अहमद ने कहा। ज़्यादातर गाँववालों के पास दावों की वैज्ञानिक सच्चाई परखने की जानकारी नहीं थी।

लगभग हर घर में स्मार्टफ़ोन होने और डेटा पैकेज सस्ते होने की वजह से यह अफ़वाह तेज़ी से फैल गई, ख़ासकर उन युवाओं में जिनके पास स्थायी रोज़गार नहीं था। इस पीछा करने की होड़ को मजबूरी ने हवा दी और डिजिटल ग़लत जानकारी की जंगल की आग ने उसे आकार दिया।

“यह दिसंबर 2019 की बात है। मुझे वह दिन आज भी साफ़ याद है,” अपने साधारण दो-कमरे के घर में बैठे, चालीस के आख़िरी दशक के एक किसान असलम ख़ान ने कहा। “किसी ने व्हाट्सऐप पर एक वीडियो भेजा था, जिसमें कहा गया था कि बिजली गिरने के बाद ज़मीन में ख़ास पत्थर रह जाते हैं। और उनकी क़ीमत लाखों में होती है।”

 

खजाने का पीछा

2022 में, खैपोरा का 26 वर्षीय जुनैद बिजली गिरने की जगह की ओर दौड़ते हुए एक चट्टानी ढलान से गिर पड़ा। उसका हाथ टूट गया और इलाज पर लगभग 30,000 रुपये खर्च हुए—यह उसके परिवार की एक महीने से भी अधिक की आय थी। एक अन्य व्यक्ति, फ़ुरक़ान वानी, गर्म मिट्टी में गड्ढा खोदते हुए झुलस गया।

“हम एक टिन की झोपड़ी में रहते हैं—मैं, मेरी माँ और मेरे दो भाई,” फ़ुरक़ान ने 101Reporters को बताया। “यहाँ कोई स्थायी काम नहीं है… जब एक दोस्त ने मुझे बिजली के पत्थरों के बारे में बताया तो लगा जैसे निकलने का रास्ता मिल गया हो। उसी शाम पास में बिजली गिरी। मैं तेज़ी से भागा, सोचने का वक़्त भी नहीं था। बस डर था कि कहीं कोई और पहले न ढूँढ ले। इसलिए मैंने नंगे हाथों से खोदना शुरू कर दिया।”

माजिद बशीर ने तो पत्थर ढूँढने की उम्मीद में 15,000 रुपये उधार लेकर एक मेटल डिटेक्टर तक ख़रीद लिया। कुछ हाथ नहीं आया और कर्ज़ देने वाले से रिश्ते बिगड़ गए। “मैंने सिर्फ़ पैसे ही नहीं गँवाए,” माजिद ने कहा। “मैंने दो हफ़्ते तक बाग़ में जाना छोड़ दिया, उस चीज़ के पीछे भागते हुए जो असली थी ही नहीं। मेरी पत्नी नाराज़ थी। मेरे बच्चे बार-बार पूछते कि मैं घर क्यों नहीं रहता।”

गाँव की रोज़मर्रा की ज़िंदगी बिखरने लगी। पुरुष काम छोड़ देते और कई मामलों में बच्चों को भी स्कूल से निकालकर तलाश में लगा देते। कुछ लोगों ने आम पत्थरों को दुर्लभ बताकर बेचने की कोशिश की, जिससे छोटे स्तर की ठगी और पड़ोसियों के बीच अविश्वास पनपा।

बारामूला, कश्मीर के कई ग्रामीण इलाक़ों की तरह, सीमित आर्थिक अवसरों वाला इलाक़ा है। जो किसान नहीं हैं, वे पर्यटन, सरकारी ठेकों या मौसमी मज़दूरी पर निर्भर रहते हैं। निर्माण, सुरक्षा या परिवहन जैसे जो कुछ काम मिलते भी हैं, वे अक्सर अस्थायी होते हैं। जो लोग इस भ्रम का शिकार हुए, उनमें से ज़्यादातर बेरोज़गार, अधरोज़गार या कर्ज़ में डूबे हुए थे।

“सबसे बड़ा कारण मेरा पत्थर नहीं था, बल्कि मेरी स्थिति थी,” जुनैद कहता है। “भले ही 1% संभावना होती कि यह सच है, मुझे कोशिश करनी ही थी।” इसी बीच, मौक़ा भाँपकर स्थानीय ठग सामने आ गए। कई ग्रामीणों ने बताया कि उनके पास कुछ तथाकथित “ख़रीदार” या “पत्थर परीक्षक” आए, जिन्होंने पत्थरों की जाँच या अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों से मिलाने के नाम पर मोटी फ़ीस वसूली। कोई सौदा पूरा नहीं हुआ।

“पूरा गाँव पागल हो गया था,” असलम ने कहा। “लेकिन सच कहूँ तो, यह किसी ग़रीब और बेरोज़गार इलाक़े में हैरानी की बात नहीं है। हम सब किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहे थे।”

 

तथ्यों के साथ जवाबी कार्रवाई

2021 तक, अहमद बहुत कुछ देख चुके थे। “मैंने अपने एक छात्र को यह कहते सुना कि उसके चाचा को बिजली का पत्थर मिला है,” वे याद करते हैं। “मुझे समझ आ गया कि यह अब सिर्फ़ अफ़वाह नहीं रही। यह एक तरह की आस्था बन चुकी थी।”

समय के साथ, कुछ ग्रामीणों को एहसास हुआ कि ये पत्थर वैसे नहीं थे जैसे वे सोचते थे। लेकिन उम्मीद अब भी बची रही।

“दिल के किसी कोने में बहुत लोग अब भी मानते हैं कि शायद कभी…” अहमद ने कहा।

70 वर्षीय हबीब ख़ान के घर में यह आस्था आज भी ज़िंदा है। “यह बिल्कुल सही है। मेरे पिता ये पत्थर इकट्ठा करते थे,” उन्होंने कहा।

“अब लोग इन्हें इसलिए नहीं ढूँढ पाते क्योंकि वे पवित्र नहीं हैं, गुनाह करते हैं। जगह भी साफ़-सुथरी होनी चाहिए।”

ऐसी ही बातें बुज़ुर्ग पुरुषों और महिलाओं द्वारा बार-बार दोहराए जाने से यह मिथक जीवित रहा और उसके साथ धोखाधड़ी भी।

2021 में, अहमद ने स्कूल में शाम को कुछ ग्रामीणों को बुलाना शुरू किया, जहाँ वे पढ़ाते हैं। ब्लैकबोर्ड पर उन्होंने समझाया कि बिजली कैसे बनती है, क्यों वह कोई पत्थर पीछे नहीं छोड़ती, और मिट्टी में बिजली का प्रवाह कैसे होता है।वह पहली बैठक अब “स्टॉर्म सेफ़्टी सर्कल” कहलाने वाली पहल का बीज बनी।

तब से ये अनौपचारिक बैठकें पास के तीन गाँवों तक फैल चुकी हैं, जो कभी स्कूल के मैदान में, कभी पंचायत दफ़्तर या सामुदायिक भवनों में होती हैं। “हम जो भी कर सकते हैं उसका इस्तेमाल करते हैं—प्रोजेक्टर, छपी हुई तस्वीरें, यहाँ तक कि खिलौनों के मॉडल—विज्ञान समझाने के लिए,” अहमद कहते हैं। “कभी-कभी डिजिटल साक्षरता बढ़ाने वाले एनजीओ मदद करते हैं, लेकिन ज़्यादातर हम ही करते हैं।”

इन सत्रों में फुलगुराइट्स की तस्वीरें भी दिखाई जाती हैं—प्राकृतिक काँच की नलियाँ जो बिजली के रेत पर गिरने से बनती हैं—ताकि बताया जा सके कि वायरल वीडियो में दिखाए गए कुछ दृश्य असली वस्तुएँ थीं, जिन्हें झूठ फैलाने के लिए ग़लत तरीक़े से इस्तेमाल किया गया। अहमद और उनके साथी स्थानीय उदाहरणों, चोटों, गँवाई हुई कमाई और पारिवारिक कलहों को सामने रखते हैं ताकि लोग सोचें। “हमारा मक़सद विश्वास करने वालों को नीचा दिखाना नहीं है,” अहमद ने कहा। “बल्कि उन्हें सोचने पर मजबूर करना है। लोग कहानियों पर भरोसा करते हैं, इसलिए हम सच्ची कहानियों का इस्तेमाल करते हैं ताकि उन्हें हक़ीक़त में वापस ला सकें।”

विडंबना यह है कि जिन डिजिटल साधनों ने इस मिथक को फैलाया, वही अब उसे तोड़ने में मदद कर रहे हैं।

अहमद की टीम कश्मीरी और उर्दू में छोटे-छोटे समझाने वाले वीडियो बनाती है, जिनमें सरल ऐनिमेशन और व्हाट्सऐप पर भेजे जाने वाले वॉइसओवर होते हैं। कुछ वीडियो में वे ग्रामीण नज़र आते हैं जिन्होंने यक़ीन करना छोड़ दिया, तो कुछ में बच्चे अपनी भाषा में बिजली की व्याख्या करते दिखते हैं।

अल्जीरिया से एकत्र किया गया फुलगुराइट का नमूना। फुलगुराइट खनिज तब बनते हैं जब बिजली रेत पर गिरती है, गहराई तक ज़मीन में प्रवेश करती है और क्वार्ट्ज क्रिस्टल या सिलिका को आपस में जोड़ देती है। इस प्रक्रिया से आपस में जमे हुए रेत के कणों का एक ठोस लेकिन खोखला ढाँचा तैयार होता है।

“हमने एक वीडियो बनाया जिसमें एक लड़का अपने दादा से पूछता है कि उन्हें क्यों लगता है कि पत्थर आसमान से गिर सकता है,” 19 वर्षीय स्वयंसेवक ज़ाहिद ने कहा। “इससे लोग हँसे भी और सोचे भी।”

एक गाँव में, शाम की नमाज़ के बाद लाउडस्पीकर से तूफ़ान के मौसम में सुरक्षा संदेश सुनाए जाते हैं। हालाँकि “स्टॉर्म चेज़र्स” (बिजली का पीछा करने वाले) की संख्या कम हुई है, लेकिन अहमद ने चेताया कि काम अभी पूरा नहीं हुआ है।

“बिजली वाला अफ़वाह तो बस एक उदाहरण था,” उन्होंने कहा। “हमने नकली नौकरी के ऑफ़र, चमत्कारी बीज और साम्प्रदायिक नफ़रत भी देखी है। असली समस्या है — सही और प्रमाणित जानकारी तक पहुँच का न होना और व्हाट्सऐप पर अंधा विश्वास।”

अब अहमद उम्मीद करते हैं कि स्टॉर्म सेफ़्टी सर्कल्स को व्यापक डिजिटल साक्षरता क्लबों में बदला जाए, जहाँ हर गाँव में स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि भविष्य में स्वास्थ्य, चुनाव या सरकारी योजनाओं पर फैलने वाली ग़लत सूचनाओं का सामना किया जा सके। उनकी टीम ने श्रीनगर-आधारित एक गैर-लाभकारी संस्था से मदद मांगी है और स्कूलों के लिए पाठ्यक्रम का मसौदा भी तैयार कर रही है।

हालाँकि, फंडिंग अभी भी एक बड़ी चुनौती है। “हम यह हमेशा नहीं कर सकते,” अहमद कहते हैं।

“हमें ऐसा रास्ता चाहिए जिससे समुदाय खुद इसे आगे बढ़ा सके।”

फिर भी, असर साफ़ दिखाई देता है। ख़ान के गाँव में पत्थर ढूँढने के दिन अब बीत चुके हैं। बच्चे फिर से स्कूल जा रहे हैं। किसान अपने बाग़ों में लौट आए हैं। अब आसमान की ओर देखने वाले सिर्फ़ वे हैं जिन्हें यह देखना है कि बारिश फ़सल को नुक़सान पहुँचाएगी या नहीं—न कि यह कि कहीं ख़ज़ाना तो नहीं गिरेगा।

“हमें चोट पहुँचाने वाला तूफ़ान नहीं था,” ख़ान धीरे से कहते हैं। “बल्कि वह था, जो हम उसके बारे में मानते थे।”


यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था और इसका हिन्दी अनुवाद रुचिका त्रिपाठी ने किया है।

About Author

Arsalan Bukhari

Arsalan Bukhari is a freelance journalist and a member of 101Reporters, a pan-India network of grassroots reporters.

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