हमारे लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया के प्रहरी, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता हाल के दिनों में तेज़ी से गिरी है। इसकी ज़िम्मेदारी विपक्ष के नेता राहुल गांधी की कम और आयोग की ज़्यादा है, खासकर चुनाव प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोपों का सामना करने के उसके तरीक़े को देखते हुए।
शायद यह स्थिति तब अपरिहार्य हो गई जब सरकार ने मार्च 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति प्रक्रिया के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्देश को खारिज कर दिया।
उस समय तक, मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं थी। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिपरिषद की सलाह पर की जाती थी, और आमतौर पर, सबसे वरिष्ठ चुनाव आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर पदोन्नत किया जाता था। इन नियुक्तियों को चुनौती देते हुए, इन वर्षों में, सर्वोच्च न्यायालय में कई याचिकाएँ दायर की गईं।

इन याचिकाओं को एक साथ मिलाकर पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने विचार किया, जिसने पाया कि नियुक्ति प्रक्रिया मनमानी थी। पीठ ने कहा कि चूँकि आयोग चुनावों का प्रहरी है, इसलिए उसे सरकार और सत्तारूढ़ दल के प्रभाव से स्वतंत्र रहना चाहिए।
पीठ ने निर्देश दिया कि नियुक्तियाँ प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की तीन सदस्यीय समिति द्वारा की जाएँ। पीठ का मानना था कि ऐसी समिति संदेह से परे होगी और पक्षपात को रोकेगी। पीठ ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक सरकार इस मामले पर कानून नहीं बना लेती।
हालांकि, कुछ महीने बाद, सरकार ने संसद में एक विधेयक पेश किया जिसने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को प्रभावी रूप से खारिज कर दिया। इस विधेयक ने तीन सदस्यीय समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर लिया। एक तरफ प्रधानमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री और दूसरी तरफ विपक्ष के नेता होने के कारण, यह स्पष्ट था कि विपक्ष के नेता की असहमति के बावजूद भी सरकार द्वारा नामित व्यक्ति ही मान्य होगा।

इस कानून के माध्यम से सरकार को दी गई अनियंत्रित शक्तियाँ वर्तमान जैसी स्थितियाँ पैदा करने के लिए बाध्य थीं, जिससे आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग गया।
राहुल गांधी द्वारा महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों, बेंगलुरु मध्य लोकसभा क्षेत्र के एक विशिष्ट क्षेत्र में अनियमितताओं और बिहार में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के संबंध में लगाए गए आरोपों पर मुख्य चुनाव आयुक्त की प्रतिक्रिया से स्थिति और बिगड़ गई।
गैर-सरकारी संगठन वोट फॉर डेमोक्रेसी (वीएफडी) द्वारा किए गए एक अध्ययन में मई 2024 के लोकसभा चुनावों और नवंबर 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के बीच मतदाता सूचियों में अनियमित बदलावों पर प्रकाश डाला गया।
केवल छह महीनों में, मतदाता सूचियों में 46 लाख से अधिक मतदाता जुड़ गए, जो 85 निर्वाचन क्षेत्रों के 12,000 मतदान केंद्रों पर केंद्रित थे—मुख्यतः उन क्षेत्रों में जहाँ भाजपा संसदीय चुनावों में हार गई थी।
एक और निष्कर्ष विधानसभा चुनावों के दौरान देर रात अचानक मतदान में आई तेज़ी थी: शाम 5 बजे तक, मतदान 58.22 प्रतिशत था, लेकिन आधी रात तक यह बढ़कर 66.05 प्रतिशत हो गया—7.83 प्रतिशत की बढ़ोतरी, यानी लगभग 48 लाख अतिरिक्त वोट।
सबसे तेज़ बढ़ोतरी नांदेड़, जलगाँव, हिंगोली, सोलापुर, बीड और धुले में दर्ज की गई, जहाँ दो अंकों में बढ़ोतरी देखी गई, जबकि ऐतिहासिक रूप से, इतनी देर से बढ़ोतरी न्यूनतम रही है। विपक्ष ने आरोप लगाया कि ये आँकड़े “साबित” करते हैं कि भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को फ़ायदा पहुँचाने के लिए अनियमितताएँ की गईं, जिसने अंततः चुनाव जीत लिया।
बेंगलुरु मध्य लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र से भी विवाद सामने आया। यह पता चला कि भाजपा उम्मीदवार सात विधानसभा क्षेत्रों में हार गया, लेकिन उसने एक विशेष क्षेत्र में अजेय बढ़त हासिल कर ली—जो 2024 के आम चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार को 33,000 मतों से हराने के लिए पर्याप्त थी। उन्होंने उस एक ही क्षेत्र से 1.1 लाख वोटों की बढ़त हासिल कर ली।
छह महीने के गहन शोध के बाद, राहुल गांधी ने भाजपा पर “वोट चोरी” का आरोप लगाया और फर्जी मतदाताओं, दोहराव और अन्य गंभीर अनियमितताओं का हवाला दिया।
मतदाता सूची के भौतिक सत्यापन से पता चला कि 11,965 मतदाता फर्जी थे, 40,009 मतदाता फर्जी पते पर थे, 10,452 मतदाता एक ही पते पर पंजीकृत थे, और 4,132 मतदाता अवैध तस्वीरों वाले थे।

उदाहरणों में एक ही पते पर 80 मतदाता, एक कमरे वाले घर में पंजीकृत 46 मतदाता और बेंगलुरु स्थित 153 बियर क्लब नामक शराब की भट्टी में रहने वाले 68 मतदाता शामिल थे, हालाँकि वहाँ कोई भी मतदाता नहीं मिला। चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ मतदाताओं को “मकान संख्या शून्य” में रहने वाला बताया गया था।
नवीनतम विवाद बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ा है। आयोग के अपने आँकड़ों के अनुसार, 65 लाख मतदाताओं को मताधिकार से वंचित कर दिया गया। आयोग ने दावा किया कि ये मतदाता या तो मर चुके हैं, अपना निवास स्थान बदल चुके हैं, या उनकी प्रविष्टियाँ दोहराई गई हैं। आयोग ने यह स्वीकार नहीं किया कि पहली बार उसने मतदाताओं पर अपनी राष्ट्रीयता साबित करने का दायित्व डाला है।
आयोग ने मतदाता पहचान पत्र या आधार कार्ड को वैध प्रमाण के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया—भले ही उन व्यक्तियों ने पिछले चुनावों में इन दस्तावेजों का उपयोग करके मतदान किया हो। इसके अलावा, उसने करोड़ों मतदाताओं को पुनः पंजीकरण के लिए लगभग एक महीने का ही समय दिया। इस पूरी प्रक्रिया का मूल स्वरूप ही बेहद संदिग्ध प्रतीत होता है।
राहुल गांधी ने आयोग द्वारा आधिकारिक तौर पर “मृत” घोषित किए गए व्यक्तियों को पेश करके आयोग की विश्वसनीयता को और नुकसान पहुँचाया। हालांकि, यह ध्यान देने योग्य बात है कि अब तक वह यह स्पष्ट रूप से नहीं बता पाए हैं कि इन बहिष्कारों से भाजपा और उसके सहयोगियों को किस प्रकार लाभ हुआ।

आरोपों का तथ्यों और आंकड़ों से जवाब देने के बजाय, आयोग ने राजनीतिक रूप से प्रतिकूल रुख अपनाया। मुख्य चुनाव आयुक्त ने घोषणा की कि विपक्ष के नेता या तो अपने आरोपों को साबित करने वाला हलफनामा दाखिल करें या राष्ट्र से “माफ़ी” मांगें।
यह निश्चित रूप से सबसे उपयुक्त प्रतिक्रिया नहीं थी। ऐसे पद पर आसीन व्यक्ति को न केवल निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ होना चाहिए, बल्कि उसे निष्पक्ष और स्वतंत्र भी माना जाना चाहिए। दुर्भाग्य से, प्रेस कॉन्फ्रेंस से ऐसी कोई धारणा नहीं बनी। गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने भाजपा नेता अनुराग ठाकुर को हलफनामा दाखिल करने के लिए नहीं कहा, जबकि उन्होंने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के निर्वाचन क्षेत्रों में अनियमितताओं के ऐसे ही आरोप लगाए थे। इस तरह के चुनिंदा जवाबों ने संस्था की विश्वसनीयता को और कमज़ोर किया है।
आयोग को एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय के रूप में कार्य करना चाहिए, जैसा कि हमेशा से माना जाता रहा है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी नए कानून के लागू होने के बाद शायद यह उम्मीद करना बहुत ज़्यादा है।
यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था और इसका हिन्दी अनुवाद रुचिका त्रिपाठी ने किया है।





