राहुल गांधी का ‘छोटा लड़का’ और चुनाव आयोग का घिनौना चेहरा
विपक्ष के नेता राहुल गांधी हमेशा मुझे चौंकाते रहे हैं।हर बार जब मैं ओखला के होली फैमिली हॉस्पिटल जाता हूं, जहां मेरे दिल का समय-समय पर इलाज होता है, तो मुझे उनकी याद आती है क्योंकि वहीं उनका जन्म हुआ था।
मैंने कभी बीजेपी द्वारा उन्हें ‘पप्पू’ कहकर जो छवि बनाई गई, उस पर विश्वास नहीं किया, क्योंकि मैं जानता हूं कि उस पार्टी में भी कई ‘पप्पू’ हैं — वो भी ऊपरी स्तर तक। मुझे मालूम है कि सत्ताधारी पार्टी ने जानबूझकर उन्हें उसी तरह चित्रित किया, जैसे केरल की लोककथाओं ‘वडक्कन पत्तुकल’ में चंदू को — ईर्ष्यालु और विश्वासघाती के रूप में — दिखाया गया।
चंदू को एक वीर योद्धा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने के लिए प्रसिद्ध लेखक एम. टी. वासुदेवन नायर की एक फिल्म की जरूरत पड़ी।
उसी तरह उन्होंने अपने चर्चित उपन्यास ‘रंडामूझम’ में भीम के चरित्र को नया रूप दिया, जिसमें भीम एक विचारशील, प्रेमपूर्ण और प्रिय पात्र के रूप में उभरता है। उससे पहले तक भीम को अक्सर उसके आवेग, अहंकार और अत्यधिक हिंसा की प्रवृत्ति के लिए आलोचना झेलनी पड़ती थी।
राहुल के मामले में, उन्हें किसी बाहरी सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ी। उन्होंने लोगों के दिलों में अपनी जगह खुद बनाई — उस निरंतरता के माध्यम से, जिससे वे नरेंद्र मोदी सरकार की अलोकतांत्रिक प्रवृत्तियों के खिलाफ बोलते रहे हैं।

जब राहुल गांधी कन्याकुमारी से कश्मीर तक पदयात्रा पर निकले, तो बीजेपी ने उन्हें ‘पप्पू’ कहना बंद कर दिया।
मैंने एक मशहूर टेलीविजन एंकर को यह कहते सुना था कि जैसे ही वे तमिलनाडु और केरल पार कर लेंगे, उन्हें बाकी यात्रा अकेले ही तय करनी पड़ेगी। लेकिन वह एंकर गलत साबित हुआ। राहुल जहां-जहां गए, वहां हजारों लोग उन्हें देखने उमड़ पड़े। उनकी ऊर्जा कभी कम नहीं हुई।
कुछ बीजेपी ट्रोलर्स ने तो यहां तक अटकलें लगाईं कि वे कोई विशेष इलेक्ट्रॉनिकली हीटेड जैकेट पहनते हैं, जो भीषण सर्दी में उनकी छाती को गर्म रखती है — जबकि बर्फबारी के दौरान उनके गले पर बर्फ की परतें जम रही थीं।
वह एंकर पूरी तरह आश्वस्त था कि राहुल किसी न किसी बहाने से अपनी यात्रा बीच में छोड़ देंगे।
लेकिन न सिर्फ उन्होंने पूरी यात्रा पूरी की, बल्कि इसके बाद उन्होंने देश के पूर्व से पश्चिम तक की एक और यात्रा भी शुरू की।
भारत के इतिहास में, महात्मा गांधी समेत किसी भी राजनेता ने ऐसी यात्राएं नहीं की हैं।
और एक दिन, जब उन्होंने बिना किसी सुरक्षा उपकरण के एक नाव से अरब सागर में छलांग लगाई, तब मुझे यह भी पता चला कि वे एक कुशल तैराक हैं। शायद यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व संभालने के बाद से वे लगातार धारा के विरुद्ध तैरते आ रहे हैं।

पिछले पखवाड़े, राहुल गांधी ने एक राजनीतिक “बम” फोड़ा, जिसने देश को हिला कर रख दिया।
यह ठीक उस दिन से पहले हुआ, जब 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर अमेरिका ने ‘द लिटिल बॉय’ नाम का परमाणु बम गिराया था — उसकी 80वीं बरसी थी। बेशक, गांधी का बम परमाणु नहीं था, लेकिन राजनीतिक प्रभाव के मामले में वह उतना ही विस्फोटक था।
हालांकि, राहुल गांधी के “बम” और ‘द लिटिल बॉय’ के बीच एक बुनियादी फर्क था।
जब अमेरिका ने हिरोशिमा पर बम गिराया, तो उसे तीन दिन बाद नागासाकी पर एक और बम गिराना पड़ा।
ध्यान देने की बात है कि नागासाकी, जो जापान का एक प्रमुख बौद्ध राष्ट्र होने के बावजूद, सबसे बड़ा ईसाई बहुल शहर था।
वहां गिराए गए बम का एक मुख्य निशाना था — एक भव्य गिरजाघर जिसकी मीनारें आसमान को छूती थीं।
लेकिन राहुल गांधी के मामले में दूसरी किसी ‘ब्लास्ट’ की जरूरत नहीं पड़ी। उनका खुलासा इतना सशक्त था कि अपने आप में ही पर्याप्त था।
आख़िरकार, उन्हें न तो भाषण देने के लिए टेलीप्रॉम्प्टर की जरूरत पड़ती है, और न ही वे पत्रकारों से मिलने से कतराते हैं —
इसके विपरीत, एक और नेता हैं जिन्हें ‘विश्वगुरु’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन जो प्रेस का सामना करने से बचते हैं।
जब राहुल गांधी ने अपना प्रेज़ेंटेशन अंग्रेज़ी में खत्म किया, तो एक पत्रकार ने उनसे आग्रह किया कि वह वही बात हिंदी में भी दोहराएं।
उन्होंने बिना कोई झिझक और बिना किसी नाराज़गी के, तुरंत अनुरोध स्वीकार कर लिया।

राहुल गांधी ने खुलासा किया कि बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाले एक विधानसभा क्षेत्र — महादेवपुरा — में एक लाख से अधिक फर्जी मतदाता पंजीकृत थे। ये कोई मामूली त्रुटियाँ नहीं थीं। कुछ मतदाता कई बूथों पर दर्ज थे। कई के पास वैध पता नहीं था। कुछ के पास फोटो तक नहीं थी।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि एक सिंगल-रूम अपार्टमेंट में पचास मतदाता “रहते” थे।
कुछ ऐसे मतदाता थे जो इतने वृद्ध थे कि उनके द्वारा फॉर्म-6 का इस्तेमाल हास्यास्पद था — यह फॉर्म तो पहली बार वोटर बनने वालों के लिए है। 18–21 आयु वर्ग का कोई भी व्यक्ति इसका इस्तेमाल करता नहीं दिखा, जबकि 70, 80 और 90 साल के बुजुर्ग इस फॉर्म से रजिस्टर किए गए थे। राहुल गांधी का कहना था कि इस बड़े पैमाने की धांधली ने भाजपा को यह सीट जिताई — जबकि इसी लोकसभा क्षेत्र की बाकी पांच विधानसभा सीटों पर वह हार गई थी।
लेकिन सवाल उठा: राहुल ने यह खुलासा करने में इतना समय क्यों लिया? इसका उत्तर छिपा है चुनाव आयोग की पुरानी और अप्रासंगिक व्यवस्था में, वह आज भी वोटर लिस्ट केवल प्रिंटेबल फॉर्मेट में देता है, जिसे इलेक्ट्रॉनिक रूप से पढ़ा नहीं जा सकता।
राहुल गांधी ने पूछा — जब आज गूगल कुछ ही सेकंड में अरबों पन्नों को स्कैन कर सकता है और जैसे ही कोई मेरा पूरा नाम इंटरनेट पर लेता है, मुझे अलर्ट मिल जाता है तो फिर राजनीतिक दलों और नागरिकों को वोटर लिस्ट क्यों ऐसे फॉर्मेट में दी जाती है, जो खोजने या विश्लेषण करने योग्य नहीं है ? अगर ये लिस्ट मशीन-रीडेबल होतीं, तो कोई भी तुरंत यह पता लगा सकता था कि देश में कितने “A.J. Philip” मतदाता हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि चुनाव आयोग मतदान केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज को 45 दिन बाद क्यों नष्ट कर देता है।
उन्होंने तीखा तंज कसा: “सीसीटीवी फुटेज को नष्ट करना ठीक वैसा ही है, जैसे कोई हत्यारा शव को जला देता है — सबूत को सदा के लिए मिटा देना।” एक दफनाया गया शव कभी भी बाहर निकाला जा सकता है और उस पर फोरेंसिक जांच की जा सकती है।
लेकिन राख — वह तो कुछ नहीं कहती। हज़ारों साल पुराने कंकाल हमें विकास की कहानी बताते हैं, लेकिन गंगा में बहाई गई राख — हमें इतिहास का एक भी अंश नहीं देती। संक्षेप में, राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की सड़ांध को उजागर कर दिया।
राहुल गांधी के गंभीर आरोपों का सीधा जवाब देने के बजाय, चुनाव आयोग ने उनसे शपथपत्र और सबूत मांगे — एक ऐसे नियम का हवाला देते हुए, जो इस मामले पर लागू ही नहीं होता। वह नियम तब लागू होता है जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान किसी व्यक्ति का नाम गलती से हटा दिया गया हो। जबकि राहुल गांधी ने तो चुनाव आयोग के अपने ही रिकॉर्ड के आधार पर यह सिद्ध किया कि आयोग की विफलताओं ने बीजेपी को लाभ पहुंचाया।
उनका दावा था कि एक ही व्यक्ति का नाम कई बूथों में दर्ज है जिसे चुनाव आयोग खुद एक क्लिक में सत्यापित कर सकता है।
वास्तव में राहुल और अन्य विपक्षी नेताओं को इससे भी आगे जाना चाहिए था
महादेवपुरा की वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण मांगते
और साथ ही इलेक्ट्रॉनिक रूप से सत्यापन योग्य मतदाता सूची की व्यवस्था पर ज़ोर देते।
भारत का चुनाव आयोग संविधानिक रूप से बाध्य है कि जब किसी क्षेत्र की वोटर लिस्ट की प्रामाणिकता पर व्यापक संदेह हो तो वह उसका पुनरीक्षण करे। आयोग ने हाल ही में बिहार में एक महीने में 8 करोड़ नामों की समीक्षा की थी तो महादेवपुरा के 6 लाख मतदाताओं की जांच तो कुछ ही दिनों में संभव है।
अगर आयोग को अपनी सूची की शुद्धता पर भरोसा है तो वह पुनरीक्षण से क्यों डरता है यदि सूची साफ-सुथरी है तो यह प्रक्रिया राहुल गांधी को गलत साबित कर देगी। लेकिन आयोग की अनिच्छा यह संकेत देती है कि उसे कहीं न कहीं सच्चाई का डर है। और अगर महादेवपुरा में इस तरह की बेशर्म धांधली हो सकती है तो क्या यह मान लेना अनुचित होगा कि दूसरे स्थानों पर भी यही खेल चला हो
क्या हमें वाराणसी की गिनती याद नहीं जब नरेंद्र मोदी कांग्रेस उम्मीदवार से पीछे चल रहे थे?
या हरियाणा जहां कांग्रेस को जीतने की पूरी संभावना थी लेकिन वह सिर्फ 22000 वोटों से हार गई इतना अंतर सरकार बनाने के लिए काफी था
2024 में बीजेपी को विपक्ष की तुलना में 25 सीटों की बढ़त मिली — और उसी के आधार पर वह आज केंद्र की सत्ता में है। अगर इन सीटों में से कुछ भी महादेवपुरा जैसी चुनावी धोखाधड़ी से हासिल की गई हैं तो फिर बीजेपी को शासन करने का नैतिक अधिकार किस आधार पर है
इसलिए अब वक्त है कि चुनाव आयोग खुद की साख बहाल करे। उसकी स्वतंत्रता निष्पक्षता और पारदर्शिता ही लोकतंत्र की नींव है।
अगर वह खुद को सत्ता का औजार बनने दे तो जनता का चुनावी प्रक्रिया से भरोसा उठ जाएगा और लोकतंत्र केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा।

सरकार को इस पूरे मामले की कोई चिंता नहीं दिखती।जब मुंबई में आतंकवादी हमले हुए थे, तो तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने इस्तीफा दे दिया था। लेकिन पहलगाम की घटना के बाद अमित शाह ने पद नहीं छोड़ा उन्हें पूरा भरोसा था कि चुनावी हेरफेर और सांप्रदायिक प्रचार बीजेपी को जिताने के लिए पर्याप्त होगा।इसी आत्मविश्वास के साथ उन्होंने घोषणा की थी कि बीजेपी अगले 30 साल तक भारत पर राज करेगी। यह भविष्यवाणी नहीं थी यह जनता के लिए एक चुनौती थी।
इस सबको एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखना जरूरी है 2023 के अंत में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून में बदलाव कर दिया गया।
पहले की चयन समिति में शामिल होते थे
- प्रधानमंत्री
- विपक्ष के नेता
- भारत के मुख्य न्यायाधीश
नए कानून में CJI को हटाकर उनकी जगह एक केंद्रीय मंत्री जिसे प्रधानमंत्री नामित करें को शामिल कर लिया गया। सामान्यत उस समय के मुख्य न्यायाधीश को इस पर आपत्ति जतानी चाहिए थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। बल्कि वे अपने घर में एक पूजा की योजना में व्यस्त थे जिसमें वे नरेंद्र मोदी को आमंत्रित करना चाहते थे जो अब देश के मुख्य पुजारी की तरह उभरे हैं क्योंकि उन्होंने अयोध्या मंदिर और नए संसद भवन दोनों का उद्घाटन किया है।
अब प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नियुक्त मंत्री इस मामले में अमित शाह जिसे चाहें उसे चुनाव आयुक्त बना सकते हैं। विपक्ष के नेता की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में महज़ एक डरावने पुतले की हो गई है। 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने इस्तीफा दे दिया। 19 फरवरी 2025 को जानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया और उनके साथ दो अन्य डॉ सुखबीर सिंह संधू और डॉ विवेक जोशी को आयुक्त नियुक्त किया गया। तीनों को सरकार ने चुना और वे सत्ता के प्रति पूरी तरह वफादार माने जाते हैं।
जानेश कुमार केरल कैडर के एक आईएएस अधिकारी गृह मंत्रालय में काम करते हुए अमित शाह के क़रीबी बन गए थे।
कहा जाता है कि उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाने और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन में अहम भूमिका निभाई। बाद में वे सहकारिता मंत्रालय में भी अमित शाह के अधीन कार्यरत रहे।
उन दिनों पत्रकार उन्हें काहवा मैन कहा करते थे क्योंकि वे मीटिंग में विशेष कश्मीरी चाय काहवा सर्व करते थे। अब वही जानेश कुमार और उनके साथ के दोनों आयुक्त शासन के वफादार अधिकारी हैं और इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि वे विपक्ष की शिकायतों के प्रति असंवेदनशील हैं।
संक्षेप में चुनाव आयोग, जो एक समय लोकतंत्र का अभेद्य प्रहरी माना जाता था आज एक ऐसे ढांचे में बदल गया है जिसे सत्ता पक्ष अपने हितों के अनुसार नियंत्रित कर रहा है और इस पर लोकतंत्र की सबसे गंभीर चिंता जताई जानी चाहिए।

2024 के चुनाव अभियान के दौरान देश ने चुनाव आयोग की पक्षपातपूर्ण भूमिका अपनी आंखों से देखी। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुलेआम सांप्रदायिक भाषण दिए यह तक कह दिया कि मुसलमान हिंदू महिलाओं के मंगलसूत्र छीन लेंगे तब भी आयोग ने कुछ नहीं किया। न सिर्फ कार्रवाई नहीं की बल्कि हल्का-सा चेतावनी नोटिस तक जारी करने से कतराया।
राहुल गांधी का ध्यान फर्जी नाम जोड़ने पर थ लेकिन उतनी ही गंभीर चिंता नामों को हटाने की भी है।उदाहरण के तौर पर सिर्फ बिहार में 65 लाख मतदाताओं को हटाया गया जिनमें अधिकांश अल्पसंख्यक और दलित समुदाय से थे और यह सब “विशेष गहन पुनरीक्षण के नाम पर हुआ। सुप्रीम कोर्ट तक इस प्रक्रिया को रोकने में अक्षम नजर आता है। जबकि समाधान बेहद सरल है
चुनाव आयोग को आदेश दिया जाए कि वह वोटर लिस्ट को इलेक्ट्रॉनिकली पढ़े जाने योग्य (machine-readable) फॉर्म में जारी करे।
तब एक क्लिक में यह पता लगाया जा सकता है कि एक ही जैसे नाम — जैसे “संजय कुमार” या “प्रिया कुमारी” — कितनी जगहों पर दोहराए गए हैं।
जब तक ऐसी पारदर्शिता नहीं आती, भारत का “विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र” होने का दावा महज़ एक खोखला नारा रह जाएगा।
यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है — यह नागरिक अस्तित्व की बात है।
मेरे एक मित्र दिल्ली में रहते हैं। उनके परिवार का उपनाम “थॉमस” है। उनके पूरे परिवार के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए —
सिवाय एक के, जिसका नाम थोड़ा हिंदू-संस्कृतनिष्ठ लगता था।
नए भारत में, अब आपकी नागरिकता का प्रमाण:
- न तो आधार कार्ड है,
- न राशन कार्ड,
- और न ही वोटर आईडी।
यह आपका नाम है।
यहीं से राहुल गांधी की बात का असली महत्व समझ आता है, उनका “बम” सिर्फ महादेवपुरा को लेकर नहीं था,
ना ही केवल एक क्षेत्र की वोटर लिस्ट की बात थी। यह लोकतंत्र की उस अंतिम कड़ी पर चोट थी, जिसे सबसे पवित्र और अराजनैतिक माना जाना चाहिए था — चुनावी प्रक्रिया।
उन्होंने जो उजागर किया वह सिर्फ आंकड़ा नहीं, सिर्फ तकनीकी चूक नहीं, बल्कि एक पूरी योजना है — बिना जनादेश के सत्ता बनाए रखने की योजना। बिना वोट के जीत दर्ज करने की कार्यप्रणाली। और जब
चुनाव आयोग पारदर्शिता से इनकार करता है,
तकनीक को जानबूझकर दरकिनार किया जाता है ताकि जांच न हो सके,
और फिर कानून बदलकर पूरे संस्थान को कब्जे में ले लिया जाता है,
तो मतदान पेटी सिर्फ एक मंच सजावट बन जाती है लोकतांत्रिक संप्रभुता की गारंटी नहीं। अब गेंद जनता के पाले में है। अगर जनता चुप रही तो लोकतंत्र एक रस्म बनकर रह जाएगा भावहीन विकल्पहीन और अर्थहीन।
ऐसे माहौल में, राहुल गांधी का सड़ांध को उजागर करना महज़ एक राजनीतिक नाटक नहीं है—यह लोकतांत्रिक बचाव का एक प्रयास है। अब असली परीक्षा उनकी नहीं, बल्कि जनता की है: क्या उनमें अब भी सच की माँग करने की इच्छाशक्ति है, या वे एक नियंत्रित लोकतंत्र की सुख-सुविधाओं से संतुष्ट हो जाएँगे।
यह लेख मूल रूप से ‘भारतीय धाराओं‘ में प्रकाशित हुआ था और इसे यहां पढ़ा जा सकता है।