A Unique Multilingual Media Platform

Articles Development Society YouTube

साखी संवाद: ‘शिक्षा के लिए शिक्षा’ विषयक छः दिवसीय कार्यशाला – Day 01

  • July 17, 2025
  • 1 min read
साखी संवाद: ‘शिक्षा के लिए शिक्षा’ विषयक छः दिवसीय कार्यशाला – Day 01

द ऐडम ने वाराणसी में शैक्षिक मूल्यों पर एक अनूठी व्याख्यान श्रृंखला, ” सखी संवाद ” के संक्षिप्त अंश प्रस्तुत प्रस्थुतः करते हैं!

स्थान: क कला दीर्घा, वाराणसी। आयोजक: साखी शोधशाला। संयोजक: प्रो. सदानंद शाही एवं मृदुला सिन्हा। उद्घाटन तिथि: 15 जुलाई 2025

 

कार्यशाला का उद्देश्य

साखी शोधशाला द्वारा आयोजित इस कार्यशाला का मकसद शिक्षा को उसकी मूल भावना—आनंद, ज्ञान और मानवीय गरिमा—के साथ पुनः जोड़ना है। यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक रचनात्मक पहल है, जो वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त रोज़गार केंद्रित सोच के बरअक्स एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

 

उद्घाटन सत्र में प्रो. सदानंद शाही के विचार

प्रो. सदानंद शाही ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि आज शिक्षा पर रोज़गार का दबाव इस हद तक बढ़ गया है कि शिक्षा का असली रूप ही समाप्त हो गया है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि “अंधकार से प्रकाश की ओर” बढ़ने वाला भाव जो शिक्षा का मूल उद्देश्य था, अब गौण हो गया है। आज युवाओं में हताशा और आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं क्योंकि शिक्षा उन्हें न तो रोज़गार दे पा रही है और न ही जीवन की गरिमा का बोध।

उनका मानना है कि शिक्षा को अर्थव्यवस्था का बोझ ढोने वाला माध्यम नहीं बनाना चाहिए, बल्कि यह एक आत्मिक और बौद्धिक विकास का क्षेत्र होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मूल्य शिक्षा अब केवल एक इनाम या ‘प्राइज’ बनकर रह गई है, जबकि इसका स्थान हमारी जीवनचर्या और व्यवहार में होना चाहिए।

 

प्रो. अवधेश प्रधान का मुख्य व्याख्यान

कार्यशाला में ‘मनुष्य निर्माण के लिए शिक्षा: सन्दर्भ—विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ’ विषय पर व्याख्यान देते हुए प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि यह कार्यशाला राष्ट्रीय महत्व की है क्योंकि “शिक्षा के लिए शिक्षा” एक गंभीर और समकालीन राष्ट्रीय प्रश्न बन चुका है। उन्होंने रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद और रबीन्द्रनाथ ठाकुर के विचारों को जोड़ते हुए बताया कि इन तीनों ने शिक्षा को मनुष्य निर्माण की प्रक्रिया माना था।

उनका कहना था कि शिक्षा केवल सूचना का संग्रह नहीं है। विवेकानंद के अनुसार मनुष्य के भीतर स्थित ब्रह्म को पहचानना और उसकी गरिमा को महसूस करना ही सच्ची शिक्षा है। वहीं रबीन्द्रनाथ का मानना था कि शिक्षा वह है जो व्यक्ति के भीतर छिपी पूर्णता को विकसित करती है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि हेड, हैंड और हार्ट—तीनों का संतुलन ही समग्र शिक्षा की पहचान है।

 

शिक्षा की पहुँच और सामाजिक न्याय 

प्रो. प्रधान ने कहा कि शिक्षा पर पहला अधिकार समाज के सबसे वंचित तबकों का है। यदि हम अब तक शूद्र कहे जाने वाले लोगों तक शिक्षा नहीं पहुँचा सके हैं, तो यह हमारे समाज का सबसे बड़ा पाप है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को चाहिए कि वे उन्हीं की भाषा, संस्कृति और शैली में जाकर उन्हें शिक्षित करें, और यह विश्वास जगाएं कि वे भी सब कुछ कर सकते हैं।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि जिस भाषा में हम प्रेम करते हैं, गुस्सा व्यक्त करते हैं और सोचते हैं, वही भाषा हमारी सबसे समर्थ भाषा है, और उसी में शिक्षा होनी चाहिए। उन्होंने सोवियत रूस के चरवाहा रात्रि पाठशालाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि शिक्षण को जीवन और परिस्थिति से जोड़ना ज़रूरी है।

 

स्त्री शिक्षा और पारंपरिक शिक्षा प्रणाली पर विचार

भारत की आधी आबादी स्त्रियां हैं, और उनके लिए शिक्षा को अनिवार्य बनाना होगा यदि समाज में सच्चे बदलाव की आशा करनी है। विवेकानंद ने ‘गुरु गृहवास’ को एक नया अर्थ दिया था। उनका मानना था कि शिक्षक का आचरण माँ जैसा होना चाहिए और लोक शिक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

प्रो. प्रधान ने यह भी कहा कि शिक्षित भद्र वर्ग कभी नहीं चाहेगा कि सभी शिक्षित हो जाएं क्योंकि फिर उनकी प्रभुता ख़तरे में पड़ जाएगी। इसलिए हमें जनसाधारण के लिए शिक्षा के वैकल्पिक रास्ते खोजने होंगे।

 

रबीन्द्रनाथ का शिक्षा-दर्शन

रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा को समग्र जीवन से जोड़कर देखा। ‘शान्तिनिकेतन’ की स्थापना के समय उन्होंने ‘समग्र’ शब्द का प्रयोग करते हुए कहा था कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान नहीं बल्कि मिट्टी, वायु, आकाश, पशु-पक्षी, साहित्य और कला—इन सबके अविच्छिन्न बोध का नाम है। उनका कहना था कि शिक्षा में कल्पनाशक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन हमने शिक्षा प्रणाली में ऐसे कई तंत्र बना दिए हैं जो बच्चों की कल्पना को दबा देते हैं।

 

प्रश्न पूछने की संस्कृति और वैज्ञानिक सोच

उन्होंने अफ़सोस जताया कि हमारे बच्चे अब जिज्ञासा नहीं रखते। रबीन्द्रनाथ को एक बार तब आश्चर्य हुआ जब उन्होंने बच्चों को पंखा चलाकर दिखाया, लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि वह कैसे काम करता है। यह जिज्ञासा की मृत्यु है। उनके अनुसार ज्ञान का पहला चरण ही प्रश्न करना है।

1935 में रूस से लौटने के बाद रबीन्द्रनाथ ने ‘विश्व परिचय’ नामक पुस्तक लिखी थी जिसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण को आमजन तक पहुँचाने की बात की गई थी। प्रो. प्रधान ने कहा कि विज्ञान की सोच न केवल देश के भीतर एकता लाती है बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भारत को जोड़ सकती है।

 

शिक्षा में लोकतंत्र और संवाद की ज़रूरत

उन्होंने राधाकृष्णन कमीशन का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षा में संवाद और लोकतांत्रिक स्पेस की ज़रूरत है। विद्यार्थी परिषद और अध्यापक परिषद के गठन से शिक्षा अधिक सहभागिता मूलक बन सकती है। आज हम पेशेवर बनाने पर तो ज़ोर दे रहे हैं—डॉक्टर, इंजीनियर, वकील—लेकिन “मनुष्य” बनाना भूल गए हैं।

 

आगामी व्याख्यान

कार्यशाला की शुरुआत 15 जुलाई को प्रो. अवधेश प्रधान के विचारोत्तेजक व्याख्यान से हुई। आने वाले दिनों में विभिन्न वक्ता शिक्षा के विविध और विचारोत्तेजक पक्षों पर चर्चा करेंगे:

  • 16 जुलाई को गौरव तिवारी “शिक्षा का आनंद” विषय पर बोलेंगे, जहाँ वे इस बात पर प्रकाश डालेंगे कि शिक्षा केवल जानकारी या कौशल प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन में आनंद और आत्मिक संतुलन का स्रोत भी हो सकती है।
  • 17 जुलाई को ध्रुव कुमार सिंह “विश्वविद्यालयीय शिक्षा” पर अपनी बात रखेंगे। उनके व्याख्यान में विश्वविद्यालयों की भूमिका, अकादमिक स्वतंत्रता और उच्च शिक्षा के समकालीन संकटों पर विमर्श अपेक्षित है।
  • 18 जुलाई को अर्चना सिंह “शिक्षा में लोकतंत्र का सवाल” पर बात करेंगी। वे शिक्षा प्रणाली में संवाद, भागीदारी और आलोचनात्मक चिंतन के लिए स्थान की ज़रूरत को रेखांकित करेंगी।
  • 19 जुलाई को सुनीत कुमार सिंह “स्वाधीनता संग्राम में शिक्षा संबंधी विचार” पर बात करेंगे। वे यह बताएंगे कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शिक्षा को कैसे सामाजिक बदलाव और चेतना के माध्यम के रूप में देखा गया।
  •  20 जुलाई को रमाकांत सिंह “श्रम और शिक्षा” विषय को संबोधित करेंगे, जहाँ वे शिक्षा को श्रम के साथ जोड़ने की ज़रूरत और उसके सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालेंगे।
  • 20 जुलाई के समापन सत्र में मनीन्द्र नाथ ठाकुर “गांधी की शिक्षा नीति” पर अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। उनसे यह अपेक्षा की जा रही है कि वे गांधी के बुनियादी शिक्षा के विचार को समकालीन परिप्रेक्ष्य में रखेंगे।

Related Blogposts: Sakhi Samvad

About Author

The AIDEM

Support Us

The AIDEM is committed to people-oriented journalism, marked by transparency, integrity, pluralistic ethos, and, above all, a commitment to uphold the people’s right to know. Editorial independence is closely linked to financial independence. That is why we come to readers for help.