विश्वविद्यालयी शिक्षा – साखी संवाद के लिए प्रो. ध्रुब कुमार सिंह का व्याख्यान – Day 03
यह कार्यशाला शिक्षा के पुनराविष्कार की एक गंभीर कोशिश है, जो आनंद, न्याय, श्रम और लोकतंत्र जैसे मूल्यों को शिक्षा के केंद्र में लाने की दिशा में पहल करती है। इस अनोखी कार्यशाला को मीडिया प्लेटफॉर्म The AIDEM कवर कर रहा है और 20 जुलाई 2025 तक होने वाले सभी व्याख्यानों की रिपोर्ट और अंतर्दृष्टियाँ साझा करता रहेगा।
स्थान: क कला दीर्घा, वाराणसी। आयोजक: साखी शोधशाला। संयोजक: प्रो. सदानंद शाही एवं मृदुला सिन्हा। उद्घाटन तिथि: 15 जुलाई 2025।
तीसरा दिन : “विश्वविद्यालयी शिक्षा” — प्रो. ध्रुब कुमार सिंह का व्याख्यान (17 जुलाई 2025)
विश्वविद्यालय ईंटों का ढांचा नहीं, ज्ञान की जिजीविषा है — इस मूल विचार के साथ इतिहासकार एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ध्रुब कुमार सिंह ने कार्यशाला के तीसरे दिन “विश्वविद्यालयी शिक्षा” विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने विश्वविद्यालयों की ऐतिहासिक भूमिका, वर्तमान चुनौतियों और शिक्षा के उद्देश्य पर गहराई से प्रकाश डाला।
भारतीय विश्वविद्यालयों की स्मृति और वर्तमान संकट
कार्यक्रम के संयोजक प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय हमारी बौद्धिक धरोहर हैं, लेकिन हमने न केवल उन्हें खो दिया बल्कि उनके जैसे संस्थान दोबारा बना भी नहीं सके। यह केवल विदेशी आक्रमणों का परिणाम नहीं था, बल्कि हमारी उदासीनता भी जिम्मेदार रही।
विश्वविद्यालय: ज्ञान और कौशल का संगम
प्रो. ध्रुब कुमार सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय कोई भवन नहीं, बल्कि ‘इल्म और फन’ — ज्ञान और कौशल — की सजीव खोज है। आज जिस तरह औद्योगिक समाज में दोनों की ज़रूरत बढ़ी है, वहीं हमने शिक्षा से आनंद और प्रयोगधर्मिता को हटा दिया है। उन्होंने कहा कि यह विरोधाभास है कि एक देश शिक्षित हो कर भी बेरोज़गार कैसे हो सकता है।
औपचारिकता बनाम लचीलापन
उन्होंने विश्वविद्यालयों की बढ़ती फॉर्मेलिटी और डिग्री केंद्रित सोच पर आलोचनात्मक टिप्पणी की। उनका मानना था कि विश्वविद्यालय को ऐसी जगह होना चाहिए जहाँ छात्र यथार्थ से परे जाकर सोच सकें। “यौवन का अर्थ ही है कि औपचारिकता से परे जाकर सच्चाई की खोज की जाए।”
शिक्षा और समाज निर्माण
प्रो. सिंह ने स्वतंत्रता संग्राम में विश्वविद्यालयों की भूमिका, धार्मिक संगठनों की सीमाएँ, और ज्ञान को एक वर्ग विशेष तक सीमित करने की प्रक्रिया पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की असली भूमिका एक सभ्य, प्रश्नाकुल, और जिज्ञासु समाज बनाना है।
ज्ञान सम्पदा और पुनर्जागरण
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि पुस्तकें ज्ञान का केवल एक भाग हैं—हमें अपनी सभ्यता की पूर्ण ज्ञान सम्पदा को फिर से खोजने की आवश्यकता है। “विश्वविद्यालय एक ऑर्गेनिक जंतु है, उसकी कद्र करनी होगी। तभी हम ज्ञान का सम्मान करना सीख पाएँगे।”
पर्यवेक्षक की टिप्पणी
पर्यवेक्षक के रूप में उपस्थित भूगोलविद् प्रो. सरफराज आलम ने कहा कि विश्वविद्यालय राष्ट्र और धर्म से भी पुरानी संस्था है। यह बाजार और संकीर्णता के विरुद्ध खड़ा होता है। उन्होंने कहा कि “जो प्रश्न करता है, वही जीवित है।” उन्होंने प्रो. वासुदेवशरण अग्रवाल का उदाहरण देते हुए कहा कि विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षक गाँव जाकर वहाँ से ज्ञान का व्यावहारिक पक्ष लेकर आएँ, तभी शिक्षा सजीव हो सकती है।
कार्यक्रम में श्रोताओं की सक्रिय उपस्थिति रही, और संवाद बेहद विचारोत्तेजक रहा।
आगामी व्याख्यान
कार्यशाला के अगले दिनों में विभिन्न वक्ता शिक्षा के विविध पक्षों पर अपनी बात रखेंगे:
- 18 जुलाई — अर्चना सिंह | शिक्षा में लोकतंत्र का सवाल: शिक्षा में संवाद, भागीदारी और आलोचना की संस्कृति की आवश्यकता।
- 19 जुलाई — सुनीत कुमार सिंह | स्वाधीनता संग्राम में शिक्षा संबंधी विचार: स्वतंत्रता आंदोलन में शिक्षा की भूमिका और उसकी समकालीन प्रासंगिकता।
- 20 जुलाई — रमाकांत सिंह | श्रम और शिक्षा: श्रम के सांस्कृतिक महत्व और शिक्षा से उसके जुड़ाव पर विमर्श।
- 20 जुलाई (समापन सत्र) — मनीन्द्र नाथ ठाकुर | गांधी की शिक्षा नीति: गांधी की बुनियादी शिक्षा के विचार और 21वीं सदी में उनकी प्रासंगिकता।
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