शिक्षा का आनंद: साखी संवाद में गौरव तिवारी का व्याख्यान – Day 02
यह कार्यशाला शिक्षा के पुनराविष्कार की एक गंभीर कोशिश है, जो आनंद, न्याय, श्रम और लोकतंत्र जैसे मूल्यों को शिक्षा के केंद्र में लाने की दिशा में पहल करती है। इस अनोखी कार्यशाला को मीडिया प्लेटफॉर्म The AIDEM कवर कर रहा है और 20 जुलाई 2025 तक होने वाले सभी व्याख्यानों की रिपोर्ट और अंतर्दृष्टियाँ साझा करता रहेगा।
स्थान: क कला दीर्घा, वाराणसी। आयोजक: साखी शोधशाला। संयोजक: प्रो. सदानंद शाही एवं मृदुला सिन्हा। उद्घाटन तिथि: 15 जुलाई 2025।
दूसरा दिन : “आनंद के लिए शिक्षा” — गौरव तिवारी का व्याख्यान (16 जुलाई 2025)
शिक्षा आनंद का कल्पतरु है — इसी मूल भावना के साथ गौरव तिवारी ने कार्यशाला के दूसरे दिन अपने व्याख्यान की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मिक आनंद और जिज्ञासा को जागृत करना होना चाहिए।
शिक्षा और तल्लीनता उन्होंने टॉलस्टॉय के पात्र लेविन और मुराकामी के पात्र नाओको के ज़रिए बताया कि किस तरह सच्चा आनंद उस स्थिति में आता है जब मनुष्य पूरी तरह से तल्लीन हो जाता है—जिसे ‘फ्लो स्टेट’ कहा जाता है। यह वही स्थिति है जहाँ शिक्षा केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन का अनुभव बन जाती है।
शिक्षा और स्वाध्याय
गौरव तिवारी ने महादेव पांडेय और स्वामी महेश्वरानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा का मूल आत्म-अनुशासन और स्वाध्याय है। जब विद्यार्थी स्वयं पढ़ने की जिज्ञासा रखता है, तब वह सच्चे अर्थों में शिक्षित होता है।
आधुनिक विश्वविद्यालयों की भूमिका
उन्होंने वर्तमान विश्वविद्यालय प्रणाली की आलोचना करते हुए कहा कि यह संस्थान अब केवल नौकरी दिलाने वाले केंद्र बनकर रह गए हैं। जबकि होना यह चाहिए कि ये स्थान छात्रों को सोचने, प्रश्न करने और स्वयं को जानने का अवसर दें।
संयोजक की टिप्पणी
कार्यशाला के संयोजक प्रो. सदानंद शाही ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध कहानी ‘तोता’ का संदर्भ देते हुए कहा कि आज की शिक्षा प्रणाली भी वैसी ही बनती जा रही है जहाँ ज्ञान को जबरन ठूँसने की कोशिश की जाती है, जबकि आनंद और स्वाभाविकता शिक्षा का आधार होना चाहिए।
पर्यवेक्षक की टिप्पणी
सुरेश के. नायर ने कहा कि गौरव तिवारी ने व्यक्तिगत अनुभवों और वैश्विक संदर्भों से यह स्पष्ट किया कि शिक्षा में आनंद कैसे पैदा किया जा सकता है। उन्होंने शिक्षा के भीतर की रचनात्मकता और आत्म-संतोष को महत्व देने की बात कही।
कार्यक्रम में प्रो. राजीव रंजन, प्रो. जाह्नवी सिंह, कु. रोशनी, रिंकी सहित कई प्रतिभागियों की उपस्थिति रही।
आगामी व्याख्यान
कार्यशाला के अगले दिनों में विभिन्न वक्ता शिक्षा के विविध पक्षों पर अपनी बात रखेंगे:
● 17 जुलाई — ध्रुव कुमार सिंह | विश्वविद्यालयीय शिक्षा: विश्वविद्यालयों की भूमिका, अकादमिक स्वतंत्रता और वर्तमान संकट पर विमर्श।
● 18 जुलाई — अर्चना सिंह | शिक्षा में लोकतंत्र का सवाल: शिक्षा में संवाद, भागीदारी और आलोचना की संस्कृति की आवश्यकता।
● 19 जुलाई — सुनीत कुमार सिंह | स्वाधीनता संग्राम में शिक्षा संबंधी विचार: स्वतंत्रता आंदोलन में शिक्षा की भूमिका और उसकी समकालीन प्रासंगिकता।
● 20 जुलाई — रमाकांत सिंह | श्रम और शिक्षा: श्रम के सांस्कृतिक महत्व और शिक्षा से उसके जुड़ाव पर विमर्श।
● 20 जुलाई (समापन सत्र) — मनीन्द्र नाथ ठाकुर | गांधी की शिक्षा नीति: गांधी की बुनियादी शिक्षा के विचार और 21वीं सदी में उनकी प्रासंगिकता।
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