“श्रम और शिक्षा” – रमाशंकर सिंह का व्याख्यान – Day 06 (Part 01)
यह कार्यशाला शिक्षा के पुनराविष्कार की एक गंभीर कोशिश है, जो आनंद, न्याय, श्रम और लोकतंत्र जैसे मूल्यों को शिक्षा के केंद्र में लाने की दिशा में पहल करती है। इस अनोखी कार्यशाला को मीडिया प्लेटफॉर्म The AIDEM कवर कर रहा है और 20 जुलाई 2025 तक होने वाले सभी व्याख्यानों की रिपोर्ट और अंतर्दृष्टियाँ साझा करता रहेगा।
स्थान: क कला दीर्घा, वाराणसी। आयोजक: साखी शोधशाला। संयोजक: प्रो. सदानंद शाही एवं मृदुला सिन्हा। उद्घाटन तिथि: 15 जुलाई 2025।
छठा दिन: “श्रम और शिक्षा” — रमाशंकर सिंह का व्याख्यान (20 जुलाई 2025)
रमाशंकर सिंह ने “श्रम और शिक्षा” विषय पर विचार रखते हुए शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त असमानताओं, श्रम की अवमानना और विश्वविद्यालयों की नैतिक ज़िम्मेदारी पर चर्चा की।
श्रम और शिक्षा: रमाशंकर सिंह
रमाशंकर सिंह ने श्रम के प्रति भारतीय समाज की उपेक्षा को रेखांकित करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था लगातार एक नई जाति व्यवस्था उत्पन्न कर रही है। विश्वविद्यालयों में पद और आय के आधार पर भेदभाव व्याप्त है, जिससे बौद्धिक और सामाजिक असमानता को बल मिल रहा है। उन्होंने कहा कि भारत में श्रम का सम्मान नहीं है और विश्वविद्यालयों का नैतिक स्वर भोथरा होता जा रहा है।
उनका मानना था कि शिक्षा व्यवस्था तब तक सार्थक नहीं हो सकती जब तक उसमें कार्यरत हर वर्ग को समान गरिमा और अवसर न दिया जाए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को सुधारने का अर्थ है—एक साथ हज़ारों परिवारों को सामाजिक न्याय की दिशा में आगे बढ़ाना।
शिक्षा और असमानता
उन्होंने एमबीए आधारित कॉर्पोरेट सोच और विश्वविद्यालयों की जमीनी ज़रूरतों के बीच के अंतर को रेखांकित किया। शोधार्थियों के बीच भी आर्थिक असमानता को उन्होंने विश्वविद्यालय की नैतिक विफलता बताया। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों को आत्मावलोकन करना चाहिए कि क्या वे वास्तव में समाज में बदलाव का साधन बन पा रहे हैं या केवल पद और वेतन की दौड़ में लगे हुए हैं।
विचारोत्तेजक टिप्पणियाँ
प्रो. रामाज्ञा शशिधर ने पूछा कि विश्वविद्यालय स्वयं श्रम और शोषण के बदलते रूपों से कैसे लड़ने को तैयार हो रहे हैं। प्रो. पद्मप्रिया ने विश्वविद्यालयों की व्यावसायिक सोच पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ज्ञान और क्रिया के बीच की विडंबना आज भी बनी हुई है।
यह कार्यशाला शिक्षा के पुनराविष्कार की एक गंभीर कोशिश है, जो आनंद, न्याय, श्रम और लोकतंत्र जैसे मूल्यों को शिक्षा के केंद्र में लाने की दिशा में पहल करती है।
इस अनोखी कार्यशाला को मीडिया प्लेटफॉर्म The AIDEM कवर कर रहा है और 20 जुलाई 2025 तक होने वाले सभी व्याख्यानों की रिपोर्ट और अंतर्दृष्टियाँ साझा करता रहेगा।
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