बिहार चुनाव: वर्ग संघर्ष और गठबंधन राजनीति की दिशा
बिहार भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक बना हुआ है। व्यापक बेरोज़गारी ने लाखों शिक्षित और अकुशल युवाओं को रोज़ी-रोटी की तलाश में दूसरे राज्यों में पलायन करने पर मजबूर कर दिया है। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में पर्याप्त शिक्षकों, बुनियादी ढाँचे और सीखने के लिए अनुकूल माहौल का अभाव है, जबकि निजी संस्थान तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली गहरे संकट में है—डॉक्टरों, नर्सों और कर्मचारियों की भारी कमी है, और मरीज़ों के प्रति लापरवाही व्यापक है। लगभग 1 करोड़ लोग बेघर हैं, और सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार संस्थागत हो गया है। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध, लूटपाट और हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
राज्य सरकार शराबबंदी लागू करने का श्रेय लेती है, फिर भी अवैध शराब के अड्डे फल-फूल रहे हैं। कुछ सड़कों और फ्लाईओवरों के निर्माण को “विकास” के प्रमाण के रूप में प्रदर्शित किया गया है, हालाँकि ये परियोजनाएँ अक्सर भ्रष्टाचार और कमीशन-आधारित ठेकों से प्रभावित होती हैं।
भारतीय जनता पार्टी-जनता दल (यूनाइटेड) गठबंधन के 20 साल के शासन के दौरान, लाखों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि नष्ट हो गई है। जहाँ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गरीबों के लिए आवास की माँग को यह कहकर खारिज कर रहे हैं कि “ज़मीन उपलब्ध नहीं है”, वहीं उनकी सरकार ने चौसा (बक्सर) में औद्योगिक परियोजनाओं के लिए 1,064 एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि का जबरन अधिग्रहण कर लिया है और प्रदर्शनकारी किसानों का क्रूरतापूर्वक दमन किया है।
इसी तरह, भागलपुर के पीरपैंती में, 1,050 एकड़ ज़मीन अडानी समूह को एक बिजली संयंत्र के लिए प्रति एकड़ एक रुपये प्रति वर्ष की सांकेतिक दर पर सौंप दी गई। इस बीच, दर्जनों बंद पड़ी चीनी मिलें और औद्योगिक इकाइयाँ बंद पड़ी हैं।

2014 के आम चुनावों से पहले, भाजपा के नरेंद्र मोदी ने विदेशों में जमा काला धन वापस लाने, हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपये जमा करने, किसानों की आय दोगुनी करने और सालाना 2 करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था। ये वादे खोखले नारे साबित हुए हैं। महंगाई अपने चरम पर है; किसान महंगे दामों पर बीज और खाद खरीदने को मजबूर हैं, और बाढ़ या सूखे से उनकी फसलें बर्बाद हो रही हैं।
खेती घाटे का धंधा बन गई है, जिससे किसान कर्ज में डूबे हुए हैं, जबकि कॉर्पोरेट मुनाफ़ा—खासकर अडानी और अंबानी जैसे बड़े समूहों का—बढ़ता जा रहा है। साथ ही, गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों के बीच जानबूझकर सांप्रदायिक विभाजन को भड़काया जा रहा है और जायज़ माँगें उठाने वालों को जेल में डाला जा रहा है।
आज, बिहार की मेहनतकश जनता एक निर्णायक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। सामंती-पूंजीवादी भाजपा-जद(यू) शासन के खिलाफ गुस्सा और आक्रोश बढ़ रहा है। यहाँ केवल सत्ता परिवर्तन की इच्छा ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, रोज़गार, समानता और सम्मान की ऐतिहासिक आकांक्षा का पुनरुत्थान भी है।
राजद की सीमाएँ और व्यापक गठबंधन की आवश्यकता
इस संघर्ष की सफलता कुछ राजनीतिक वास्तविकताओं पर निर्भर करती है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) किसी भी परिस्थिति में इस लड़ाई को अकेले निर्णायक विजय तक नहीं पहुँचा सकता। बिहार का सामाजिक और वर्गीय ढाँचा एकदलीय प्रभुत्व के युग से बहुत आगे निकल चुका है।
राजद के युवा नेता तेजस्वी यादव—जो वर्तमान में वामपंथी दलों और कांग्रेस के साथ भारत ब्लॉक के एक प्रमुख घटक के रूप में कार्यरत हैं—को संकीर्ण दलीय हितों से ऊपर उठना होगा। उन्हें व्यापक एकता, वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक शक्ति के निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। गठबंधन की राजनीति को सीटों के बँटवारे के गणित तक सीमित नहीं किया जा सकता; इसे साझा विचारों, संघर्षों और उद्देश्यों की राजनीति के रूप में विकसित होना होगा।
वामपंथ का योगदान और वर्गीय दृष्टिकोण की उपेक्षा
वामपंथियों को केवल राजद के “पालकी ढोने वाले” के रूप में देखना राजद के भीतर बढ़ते वर्गीय अहंकार और अवसरवाद को दर्शाता है। इससे न केवल गठबंधन की नैतिक और राजनीतिक विश्वसनीयता कमज़ोर होती है, बल्कि जनता में वैचारिक भ्रम भी पैदा होता है। ऐतिहासिक रूप से, वामपंथी ताकतें बिहार के जन संघर्षों की रीढ़ रही हैं—चाहे वह भूमि सुधार हों, मज़दूर अधिकार हों, किसान आंदोलन हों या सांप्रदायिकता का प्रतिरोध। वामपंथ के वर्ग-आधारित और जन-केंद्रित स्वरूप की अनदेखी करना राजनीतिक रूप से विनाशकारी होगा।
यदि वामपंथी सभी 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं, तो राजद के लिए परिणाम गंभीर हो सकते हैं। राजद नेता लालू प्रसाद ने स्वयं अपने राजनीतिक जीवन में इस गतिशीलता का अनुभव किया है; तेजस्वी यादव के लिए, उस गलती को दोहराना एक गंभीर राजनीतिक भूल होगी।
बदलती राजनीतिक संस्कृति और आकांक्षाएँ
आज बिहार में असली चुनौती केवल सरकारें बदलना नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति को बदलना है। वर्ग एकता, वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक समन्वय के बिना, जनता की आकांक्षाएँ जातिगत समीकरणों और अवसरवादी गठबंधनों में फँसी रहेंगी।
रोज़गार, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन की चाहत रखने वाली युवा पीढ़ी पुराने प्रतीकों और जाति-आधारित राजनीति से आगे बढ़ना चाहती है। लोकतांत्रिक ताकतों, वामपंथी संगठनों और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को सामूहिक रूप से इस ऐतिहासिक परिवर्तन को रचनात्मक दिशा में ले जाना चाहिए।

बिहार में संघर्ष केवल चुनावी सफलता के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक पुनर्निर्माण के लिए भी है। इस धरती में वर्ग संघर्ष की एक नई चेतना को जन्म देने की क्षमता है—बशर्ते गठबंधन की राजनीति अवसरवाद से ऊपर उठकर न्याय, समानता और जनकल्याण के मूलभूत आदर्शों को अपनाए।
अगर तेजस्वी यादव और राजद इस ऐतिहासिक अवसर का लाभ उठाते हैं, तो बिहार का राजनीतिक परिदृश्य एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो इतिहास उन्हें एक बार फिर उसी चौराहे पर खड़ा पाएगा—जहाँ वर्गीय अहंकार और वैचारिक भ्रम ने जनता की उम्मीदों को अधूरा छोड़ दिया था।
यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था और इसका हिन्दी अनुवाद रुचिका त्रिपाठी ने किया है।
यह लेख न्यूज़क्लिक पर भी प्रकाशित हुआ था और इसे यहां पढ़ा जा सकता है।





