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हिन्दी हार्टलैंड पर ग़ज़ाला वहाब के साथ किताब बैठक

  • November 27, 2025
  • 1 min read
हिन्दी हार्टलैंड पर ग़ज़ाला वहाब के साथ किताब बैठक

गौरव तिवारी: बुक बैठक श्रृंखला के आठवें एपिसोड में आप सबका स्वागत है। आज हम इस एपिसोड में एक नई किताब हिंदी हार्टलैंड पर चर्चा करेंगे। इस किताब की लेखिका हैं गज़ाला वहाब, और हम उनसे इस पुस्तक के बारे में बात करेंगे।

सबसे पहले हम यह जानना चाहेंगे कि ‘हिंदी हार्टलैंड’ वास्तव में क्या है। आपने भारत की भौगोलिक संरचना में इसे किस तरह मैप किया है? कौन-कौन सी जगहें हिंदी हार्टलैंड का हिस्सा हैं, और जो इसमें शामिल नहीं हैं, वे क्यों नहीं हैं? साथ ही, जो जगहें इसमें आती हैं, वे क्यों आती हैं?

ग़ज़ाला वहाब: ‘हिंदी हार्टलैंड’ को लोकप्रिय धारणा में अक्सर ‘काऊ बेल्ट’ कहा जाता है—एक नकारात्मक या मज़ाकिया संदर्भ में। लेकिन वास्तव में यह एक भौगोलिक क्षेत्र है, जो एक विशेष भौगोलिक संरचना के कारण बना है, और वह है इंडो-गैंगेटिक वैली

भूगोल के अनुसार यह क्षेत्र राजस्थान से शुरू होकर पूर्व में झारखंड के राजमहल हिल्स तक फैला हुआ है। हालांकि हरियाणा और हिमाचल प्रदेश भी हिंदी भाषी राज्य हैं, इन्हें इस परिभाषा में शामिल नहीं किया जाता क्योंकि वे इंडस वैली क्षेत्र का हिस्सा माने जाते हैं। यही कारण था कि मैंने हिंदी हार्टलैंड की परिभाषा में इन्हें बाहर रखा।

धीरे-धीरे जब मैं इस पर काम कर रही थी, तो मुझे एहसास हुआ कि यह क्षेत्र भूगोल की वजह से ही एक इकाई बना है। इसके बनने में कई कारक थे, जिनमें भूगोल ने अहम भूमिका निभाई। उत्तर में हिमालय, दक्षिण में डेक्कन प्लेटो, पश्चिम में राजस्थान का रेगिस्तान और पूर्व में राजमहल की पहाड़ियाँ व घने जंगल—इन प्राकृतिक सीमाओं ने इस क्षेत्र को परिभाषित किया। इनके बीच कोई बड़ी रुकावट नहीं थी, जिससे लोगों का आवागमन ऐतिहासिक रूप से आसान रहा।

यहां की ज़मीन समतल है, मौसम अपेक्षाकृत संतुलित है—गर्मी ज़रूर है, लेकिन कोई अत्यधिक प्राकृतिक आपदा जैसे भूकंप या चक्रवात नहीं होते। इसी कारण यहां बड़े भू-भागों पर खेती संभव हुई और समृद्धि स्वाभाविक रूप से विकसित हुई। जब बाहरी आक्रमणकारी आए, तो उनका विस्तार सबसे पहले इसी क्षेत्र में हुआ। पंजाब से लेकर बिहार और झारखंड तक उन्हें एक खुला मैदान मिला, जहां वे साम्राज्य बढ़ा सकते थे और एकीकृत अर्थव्यवस्था बना सकते थे।

इसका परिणाम यह हुआ कि भाषा में भी समानता आने लगी। यद्यपि भोजपुरी, अवधी, ब्रज, मगही जैसी अलग-अलग बोलियाँ थीं, लेकिन लगातार आवागमन और केंद्रीय सत्ता—चाहे सल्तनत हो या बाद में मुग़ल साम्राज्य—के कारण शब्दावली में समानता आई। व्याकरण अलग थी, पर शब्दों में मेल-जोल बढ़ा। इससे इस क्षेत्र को एक सांस्कृतिक और भाषाई रूप से जोड़ने में मदद मिली।

यही कारण है कि इतनी विविधता होने के बावजूद हिंदी बेल्ट एक जुड़ा हुआ क्षेत्र बना रहा। आज़ादी के बाद भी इसे एक इकाई माना गया, जबकि वास्तव में यह पूरी तरह एकसमान नहीं है। बाद में जब ‘बीमारू राज्यों’ की संज्ञा दी गई, तो इसमें भी यही क्षेत्र शामिल किया गया।

गौरव तिवारी: यह किताब किस बारे में है? क्या यह इतिहास की किताब है, समाजशास्त्र की किताब है, अर्थशास्त्र की किताब है या मानवशास्त्र का अध्ययन है? अगर हाँ, तो यह किस कालखंड को कवर करती है? इसका समय काल कितना है?

ग़ज़ाला वहाब: असल में यह किताब किसी एक जॉनर में फिट नहीं होती। मेरे नज़रिए से यह किताब इस क्षेत्र को मेरी ओर से एक श्रद्धांजलि है, क्योंकि मैं खुद इसी क्षेत्र से हूं।

आप देखिए, यहां से कितनी तरह की सोच और परंपराएं उभरीं—चाहे वह हिंदू धर्म से जुड़ी हों, जैसे रामायण या गीता, जो यहीं लिखी गईं, विशेषकर बनारस में। इस्लाम की कई धाराएं भी यहीं से निकलीं—दार-उल-उलूम देवबंद ने देवबंदी विचारधारा को जन्म दिया, बरेलवी सोच, तबलीगी जमात, और जमात-ए-इस्लामी जैसी संस्थाएं भी इसी क्षेत्र से उभरीं। जमात-ए-इस्लामी तो एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में सामने आई, जिसने राजनीतिक इस्लाम का विचार प्रस्तुत किया।

बौद्ध धर्म भी इसी क्षेत्र से निकला, उसकी सोच और दर्शन यहीं विकसित हुए। यह सब इस बात का प्रमाण है कि यहां लंबे समय तक शांति रही। लोग एक-दूसरे से संवाद करते थे, सीखते थे, और विचार-विमर्श करते थे। इसी कारण यहां अत्यधिक समृद्धि और आर्थिक खुशहाली भी रही। बड़े-बड़े महल, किले और ताजमहल जैसी इमारतें इसी क्षेत्र की संपन्नता से संभव हुईं। यहां का इंफ्रास्ट्रक्चर और सड़कें भी इस बात का सबूत हैं कि यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों का हिस्सा था—चाहे सिल्क रूट हो या समुद्री व्यापार।

भारत एक समय वैश्विक व्यापार में बहुत बड़ा योगदान देता था, और उसका केंद्र यही हिंदी क्षेत्र था। यहां से व्यापार सूरत बंदरगाह तक जाता था। यह सब दर्शाता है कि यह क्षेत्र कभी भी ‘बीमारू’ या पिछड़ा नहीं था, बल्कि समृद्ध और शांतिपूर्ण था। विविधता के बावजूद लोग मिलजुल कर रहते थे।

तो आपके सवाल का उत्तर यह है कि यह किताब किसी एक श्रेणी में नहीं आती। यह किताब इस बात को समझने का प्रयास है कि इतने समृद्ध इतिहास के बावजूद हम आज इस स्थिति तक कैसे पहुंचे—जहां हम पिछड़े हुए हैं, झगड़ों में उलझे हैं, और असहिष्णुता इतनी बढ़ चुकी है।

इसलिए इसमें इतिहास भी है—जिसका आरंभ मैंने दिल्ली सल्तनत के बनने से किया है, क्योंकि वह इस क्षेत्र का सबसे बड़ा विघटनकारी क्षण था। उससे पहले यहां कोई बड़ी रियासतें नहीं थीं, केवल छोटी-छोटी सत्ता इकाइयां थीं। मैंने लगभग 1100 ईस्वी से लेकर ब्रिटिश काल और 1947 तक का इतिहास इसमें शामिल किया है।

लेकिन यह सिर्फ इतिहास की किताब नहीं है। इसमें समाज पर टिप्पणी है, सामाजिक बहसों पर चर्चा है, और अर्थव्यवस्था पर भी दो अध्याय हैं—कि यह अर्थव्यवस्था कैसे बनी और उसके स्तंभ क्या थे। इस तरह यह किताब किसी एक श्रेणी में सीमित नहीं है।

गौरव तिवारी: जैसा आपने बताया कि किताब का ऐतिहासिक कवरेज बहुत व्यापक है। यह किताब लगभग 1100 ईस्वी से शुरू होती है, जब अफगानिस्तान से लोग यहां पर आक्रमण या युद्ध के लिए आए। इसके बाद यह किताब 2020 तक की ऐतिहासिक यात्रा को कवर करती है—लगभग एक हज़ार वर्षों का विस्तार।

इसमें एक बहुत दिलचस्प दृष्टिकोण है। आमतौर पर यह माना जाता है कि भारत में शासन का जो मॉडल आया, वह सब कुछ ब्रिटिश लेकर आए थे और उससे पहले ऐसा कुछ नहीं था। लेकिन किताब इस धारणा को चुनौती देती है। इसमें बताया गया है कि शासन की प्रक्रिया, उद्योगों के विकसित होने की प्रक्रिया, और कर संग्रहण की व्यवस्था बहुत पहले से शुरू हो चुकी थी।

तो मेरा सवाल यह है कि इन एक हज़ार वर्षों में हिंदी क्षेत्र में किस तरह की उद्योग-व्यवस्था विकसित हो रही थी? अलग-अलग कालखंडों में कौन-कौन सी इंडस्ट्रीज़ उभरीं और वे शासन की संरचना के साथ किस तरह विकसित होती गईं?

ग़ज़ाला वहाब: देखिए, पूरे हिंदी बेल्ट में उद्योग एक समान तरीके से नहीं फैले थे—हर जगह पर उद्योग नहीं थे, और यह बात आज के संदर्भ में समझना ज़रूरी है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में कला-कौशल पर आधारित उद्योग विकसित हुए और उनके आसपास पूरा एक इकोसिस्टम बना। बनारस में बुनाई का केंद्र बना—सिर्फ बुनाई ही नहीं, बल्कि टेक्सटाइल की डाइंग, नक्काशी, और फिर उसकी मार्केट—सब कुछ शहर में जुड़कर एक संपूर्ण व्यवस्था बन गई। फिरोज़ाबाद में कांच का काम विकसित हुआ और वहीँ उसका इकोसिस्टम खड़ा हुआ।

लेदर का मामला दिलचस्प है: जूते आगरा में बनते थे, बड़े कारखाने वहीं थे, मगर लेदर की टैनिंग कानपुर में होती थी, क्योंकि टैनिंग के लिए गंगा का पानी जमुना की तुलना में बेहतर माना गया। यानी पूरे यूपी में फ्लेक्सिबल और स्मॉल-स्केल मैन्युफैक्चरिंग फैली हुई थी, और यह आधुनिक समय की बात नहीं—यह मुग़लों के आने से पहले ही शुरू हो चुका था।

राजस्थान—खासकर जयपुर—में सेमी-प्रेशियस और यूटिलिटेरियन स्टोन्स की माइनिंग बहुत वर्षों से होती रही। वहां की अर्थव्यवस्था का आधार माइनिंग था: मार्बल, ग्रेनाइट, लाइमस्टोन आदि। बिहार में अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि रहा। मध्य प्रदेश में हैंडीक्राफ्ट और बुनाई के केंद्र—जैसे महेश्वर और इंदौर—के साथ-साथ प्राकृतिक और वन संसाधनों पर आधारित गतिविधियाँ थीं। कुल मिलाकर, इस बेल्ट में आर्थिक वृद्धि के आधार अलग-अलग प्रदेशों में स्वाभाविक रूप से बने।

जहां तक शासन की बात है, केंद्रीय सत्ता—दिल्ली सल्तनत—का संगठित प्रभाव बलबन के दौर से स्पष्ट दिखता है। बलबन का राजनीतिक आत्मपरिचय ‘भारतीय शासक’ के रूप में बना, क्योंकि उनकी प्रतिष्ठा और अधिकार यहीं से उपजे। उनके समय में उद्योगों का सुसंगठित विकास इसलिए भी बढ़ा क्योंकि उन्हें अपनी शक्ति की वैधता यहीं के संसाधनों और राजस्व से निर्मित करनी थी। बड़े पैमाने पर वनभूमि को खेती योग्य भूमि में बदला गया, जिससे उत्पादन और स्थानीय अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ।

केंद्रीय सत्ता के स्थिर होते ही क़ानून-व्यवस्था सुधरी और व्यापार मार्ग सुरक्षित हुए, क्योंकि राजस्व का बड़ा हिस्सा व्यापार से आता था। सिल्क रूट से जुड़ाव सुरक्षित हुआ; सूरत जैसे बंदरगाह तक कारवां बिना लूट-खसोट के पहुँचने लगे। उस समय समुद्री व्यापार में पुर्तगाली प्रमुख थे, दक्षिण में फ़्रांसीसी भी सक्रिय थे, और मुग़लों की अनुमति लेकर विदेशी व्यापारी समकक्ष साझेदार की तरह व्यापार करते थे।

इसी प्रक्रिया में उद्योग-आधारित अर्थव्यवस्था और राजस्व मॉडल सुदृढ़ हुए—सरकार को कर अदा किया जाता था, मुद्रा प्रचलन व्यवस्थित था, और बहु-स्तरीय करेंसी (जैसे दाम, पैसा) का उपयोग होता था। इसलिए यह कहना गलत है कि आधुनिक शासन या प्रशासनिक व्यवस्थाएँ हमने केवल ब्रिटिशों से सीखी। ये प्रणालियाँ पहले से मौजूद थीं—इसीलिए अंग्रेज यहाँ शुरू में व्यापार करने ही आए और बाद में साम्राज्य निर्माण की ओर बढ़े। यह बात स्वीकार न करना, दरअसल, अपने इतिहास से नज़र चुराना है।

गौरव तिवारी: किताब में आपने यह भी बताया है कि मुग़ल काल के दौरान इस पूरे क्षेत्र में एक सर्विस क्लास इंडस्ट्री भी विकसित हुई थी।

ग़ज़ाला वहाब: जब बड़ी सल्तनतें बन जाती हैं, तो उन्हें चलाने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था की ज़रूरत होती है। और यह ज़रूरत केवल राजधानी तक सीमित नहीं रहती—जिलों में, सूबों में, हर स्तर पर लोगों की आवश्यकता होती है। रिकॉर्ड रखने वाले, राजस्व वसूलने वाले—ऐसे कई पदों की मांग बढ़ी। यही वह समय था जब सरकारी नौकरी का विचार आकार लेने लगा।

सरकारी नौकरियों के साथ एक नई मिडिल क्लास भी उभरा। अब समाज केवल राजा-महाराजाओं, ज़मींदारों या बड़े सैन्य अधिकारियों तक सीमित नहीं रहा। सैनिक जनरल्स को ज़मीनें मिलती थीं और वे छोटे-छोटे शासक बन जाते थे, लेकिन इनके अलावा एक कामकाजी वर्ग भी सामने आया।

यह वर्ग केवल शासन के साथ सीधे काम करने वालों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन पर निर्भर रहने वाले भी इसमें शामिल थे। जैसे—कारीगर, जो कपड़े बुनते ही नहीं, बल्कि उन पर कढ़ाई करते, नक़्काशी करते, आभूषण बनाते। इस तरह की एंसिलरी इंडस्ट्रीज़ धीरे-धीरे विकसित हुईं, क्योंकि उन्हें शाही संरक्षण मिलता था।

इसी तरह संगीतकार, कलाकार, चित्रकार, लेखक और लिपिक भी अलग-अलग श्रेणियों में सामने आए। यह सब एक नए प्रकार के रोज़गार का हिस्सा बन गया।

इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था के तीन स्तर स्पष्ट हो गए—प्राथमिक क्षेत्र, द्वितीयक क्षेत्र और सहायक क्षेत्र। यानी, मुग़ल काल में ही ये तीनों सेक्टर मौजूद थे और एक संगठित आर्थिक ढाँचे का हिस्सा बन चुके थे।

गौरव तिवारी: जब दिल्ली सल्तनत का काल था—यानी 1100–1200 ईस्वी के बाद का समय—उसी दौरान हिंदुस्तान में सूफ़ी परंपरा भी विकसित हो रही थी। किताब में एक बहुत दिलचस्प हिस्सा है, जिसमें बताया गया है कि सल्तनत और सूफ़ी संतों के बीच एक तरह का प्रतिस्पर्धा थी। वे एक साझा सामाजिक और सांस्कृतिक स्पेस के लिए संघर्ष कर रहे थे। तो मेरा सवाल है: यह साझा स्पेस क्या था, और इस प्रतिस्पर्धा में अंततः कौन आगे आया?

ग़ज़ाला वहाब:आख़िरकार तो वही प्रबल होता है जिसके पास ताक़त होती है—यह स्वाभाविक है। लेकिन यह भी सच है कि सूफ़ियों की अपील आम जनता में बहुत गहरी थी। इसी कारण शासक वर्ग को भी सूफ़ियों की राय को महत्व देना पड़ता था, ताकि उनके आदेश जनता तक आसानी से पहुँच सकें। इस वजह से सल्तनत और सूफ़ियों के बीच एक तरह की प्रतिस्पर्धा रही।

यह प्रतिस्पर्धा विशेष रूप से चिश्तिया सिलसिले में दिखाई देती है। जैसे अजमेर के ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती या दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन चिश्ती—ये सूफ़ी सत्ता को महत्व नहीं देते थे। उनकी उपस्थिति अपने आप में एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र बन जाती थी, चाहे वे ऐसा करना चाहते हों या नहीं।

मैंने किताब में अलाउद्दीन खिलजी का एक दिलचस्प प्रसंग भी लिखा है। जब वे इलाहाबाद के गवर्नर थे, तब एक सूफ़ी ने भविष्यवाणी की थी कि वे हिंदुस्तान के राजा बनेंगे। बाद में जब उनके चाचा की मृत्यु हुई—जिसे लेकर यह आरोप लगा कि अलाउद्दीन ने उन्हें मरवाया—तो यह कभी साबित नहीं हुआ। उस समय एक सूफ़ी ने उन्हें ‘क्लीन चिट’ दी कि वे दोषी नहीं हैं। लोगों ने सूफ़ी की बात मान ली और अलाउद्दीन की प्रतिष्ठा बच गई। इससे स्पष्ट होता है कि सूफ़ी भी सत्ता केंद्रों से अपनी शक्ति खींचते थे।

उन्हें भी लगता था कि यदि वे सुल्तान या बादशाह के ‘गुड बुक्स’ में रहेंगे, तो उनकी अपनी अथॉरिटी भी बढ़ेगी। हालांकि चिश्तिया सिलसिला इस मामले में विशिष्ट था। उन्होंने बहुत सख़्ती से कहा कि उन्हें सुल्तानों से मिलना तक स्वीकार नहीं है। उनका कहना था कि यदि सुल्तान एक दरवाज़े से अंदर आएंगे, तो वे दूसरे दरवाज़े से बाहर निकल जाएंगे। यह बात हज़रात निज़ामुद्दीन की है | 

गौरव तिवारी: धीरे-धीरे, अंग्रेजों के आने के बाद—ख़ासकर 19वीं और 20वीं सदी में—कम से कम उत्तर प्रदेश और बिहार में धार्मिक पहचान ही लोगों की प्राथमिक पहचान बन गई।

पहले लोगों का वर्गीकरण उनके काम, उनके व्यापार या आजीविका के आधार पर होता था। लेकिन इस दौर में सब कुछ केवल ‘हिंदू’ या ‘मुस्लिम’ के रूप में देखा जाने लगा। बातचीत भी इसी पर केंद्रित हो गई—या तो हिंदुओं के बारे में बात हो रही थी या मुसलमानों के बारे में।

किसानों को अब ‘हिंदू किसान’ या ‘मुस्लिम किसान’ कहा जाने लगा, न कि केवल ‘किसान’। इसी तरह सर्विस क्लास या अन्य वर्गों की पहचान भी धार्मिक आधार पर तय होने लगी।

तो मेरा सवाल यह है: इतिहास में यह बदलाव कैसे हुआ? क्या यह शुरुआत से ही मौजूद था, या कोई विशेष कालखंड था जिसके बाद यह धार्मिक पहचान इतनी मज़बूत होकर प्राथमिक पहचान बन गई, और हम आज जिस स्थिति में हैं वहां तक पहुँचे?

ग़ज़ाला वहाब: देखिए, इसके लिए मैं ब्रिटिशों को ज़िम्मेदार ठहराऊँगी। और यह बात सही नहीं है कि यह केवल उत्तर प्रदेश और बिहार तक सीमित थी—राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी धार्मिक चेतना उतनी ही मज़बूत थी। फर्क सिर्फ इतना था कि उसकी अभिव्यक्ति अलग रूप में सामने आई।

सबसे पहले आपके प्रश्न के पहले हिस्से को संबोधित करुँगी। 1857 की लड़ाई के बाद ब्रिटिशों ने तय किया कि उनका मुख्य निशाना मुसलमान होंगे, क्योंकि विद्रोह बहादुर शाह ज़फ़र के नाम पर लड़ा गया था। उन्हें राजद्रोह के लिए मुकदमे में घसीटा गया—जो अपने आप में अजीब था, क्योंकि एक राजा को राजद्रोह के लिए कैसे दोषी कहा जा सकता है। इस निर्णय के बाद मुसलमानों को मुख्य शत्रु मान लिया गया और यहीं से विभाजन की प्रक्रिया शुरू हुई।

हालाँकि, यह ध्यान देने योग्य है कि 1857 के विद्रोहियों में बहुसंख्यक हिंदू थे—लगभग 60 से 70 प्रतिशत। अवध क्षेत्र के सिपाहियों में बड़ी संख्या ब्राह्मणों की थी। फिर भी ब्रिटिशों ने जानबूझकर यह विभाजन पैदा किया। दिल्ली के बड़े साहूकार, जो मुग़लों और अंग्रेजों दोनों को उधार देते थे, उन्होंने भी ताक़तवर पक्ष के साथ खड़े होकर अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस पाने की कोशिश की।

इससे पहले ही भाषा के आधार पर विभाजन शुरू हो चुका था। फोर्ट विलियम कॉलेज में जब अंग्रेजों ने अपने अधिकारियों को स्थानीय भाषा और संस्कृति सिखाने के लिए प्राइमर तैयार किए, तो मुस्लिम मौलाना फ़ारसी और अरबी स्रोतों से लिख रहे थे, जबकि हिंदू पंडित रामायण और महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथों से सामग्री ले रहे थे। परिणामस्वरूप, एक ही ‘हिंदुस्तानी’ भाषा में दो अलग-अलग रूप सामने आए—एक में फ़ारसी-अरबी शब्दावली अधिक थी, दूसरे में संस्कृत शब्द। अंग्रेजों ने इसे धर्म आधारित भाषाई विभाजन के रूप में देखा और इसे संस्थागत रूप दिया।

प्रिंटिंग प्रेस के आने के बाद मानकीकरण की ज़रूरत ने इस विभाजन को और मज़बूत किया। अब विविधता की जगह एकरूपता चाहिए थी। इसी कारण धार्मिक पहचानें कठोर होने लगीं। पहले लोग दरगाह भी जाते थे और होली भी खेलते थे, लेकिन अब उन्हें मजबूर किया गया कि वे केवल एक पहचान चुनें।

1857 के बाद दारुल-उलूम देवबंद की स्थापना हुई, जिसका एजेंडा मुस्लिम पहचान को स्पष्ट करना था। खासतौर से महिलाओं पर ध्यान दिया गया—कपड़े, रूप-रंग और आचरण के निर्देश दिए गए ताकि वे हिंदू न लगें। उदाहरण के लिए, बिंदी लगाने से मना किया गया और धार्मिक भय दिखाया गया। यह सब कुरान में नहीं था, बल्कि पहचान को कठोर बनाने की कोशिश थी।

इसी तरह हिंदू पहचान भी आर्य समाज के आगमन के बाद सुदृढ़ होने लगी। उन्होंने ‘एक पवित्र पुस्तक’ और ‘एक प्रणाली’ की बात की—यानी हिंदू धर्म को कैथोलिक धर्म की तरह संगठित करने का प्रयास किया गया।

इस तरह अंग्रेजों के प्रयासों और उनके प्रोत्साहन से धार्मिक पहचानें लगातार कठोर होती गईं। आज़ादी की लड़ाई तक आते-आते यह विभाजन बहुत मज़बूत हो चुका था। हिंदू और मुसलमान दोनों अंग्रेजों से लड़ रहे थे, लेकिन साथ ही आपस में भी संघर्ष कर रहे थे। क्योंकि दोनों चाहते थे कि ब्रिटिश शासन के बाद जो भी नया स्वरूप भारत का बने, उसमें उनकी धार्मिक पहचान सुरक्षित रहे। समस्या यहीं से शुरू हुई।

गौरव तिवारी: किताब के अलग-अलग हिस्सों से लोग सहमत भी हो सकते हैं और असहमत भी। हर किसी का अपना व्यक्तिगत दृष्टिकोण रहेगा। लेकिन आप पाठकों से क्या अपेक्षा करती हैं? इस किताब से वे कौन-सी व्यापक सीख लेकर जाएँ? आप इस किताब के माध्यम से पाठकों तक क्या संदेश पहुँचाना चाहती हैं?

ग़ज़ाला वहाब: मेरे किताब लिखने का मक़सद यही था कि हमारी वर्तमान पीढ़ी यह समझ सके कि जिस तरह से हम आज अपने क्षेत्र और अपने इतिहास को देखते हैं, ऐसा हमेशा नहीं था। हमारा अतीत बेहद समृद्ध रहा है—सांस्कृतिक रूप से भी। और यह समृद्धि इसलिए थी क्योंकि हम मिलजुल कर रहते थे।

धार्मिक, जातिगत या आर्थिक वर्गों के विभाजन के बावजूद हमारे बीच एक गहरी परस्पर निर्भरता थी। मैंने किताब में उदाहरण दिए हैं कि जहाँ-जहाँ हिंदी बेल्ट में उद्योगों में हिंदू और मुस्लिम समुदायों की परस्पर निर्भरता रही, वहाँ बड़े पैमाने पर दंगे कभी नहीं हुए। बनारस में सदियों से छोटे स्तर के दंगे होते रहे, लेकिन कभी जमशेदपुर, भागलपुर या गुजरात जैसी स्थिति नहीं बनी। आगरा में, जहाँ से मैं आती हूँ, 1991 में पहली बार दंगा हुआ था—उससे पहले लोगों को पता ही नहीं था कि दंगा क्या होता है।

इसका कारण यही था कि कारखाने और उद्योग आपस में जुड़े हुए थे। मालिक कोई और था, मज़दूर कोई और। अगर कोई दंगा होता, तो आर्थिक नुकसान दोनों को होता। बनारस में साड़ी का धागा कहीं और से आता, बुनाई कोई और करता, और बिक्री कोई और करता। इस तरह की परस्पर निर्भरता हमेशा से रही है।

इसका मतलब यह नहीं कि लोग एक-दूसरे के साथ बैठकर खाना खाते थे या रोटी-बेटी का रिश्ता था। लेकिन सहिष्णुता थी—‘तुम जैसे रहना चाहते हो रहो, हम जैसे रहना चाहते हैं हम रहें।’ यही सहिष्णुता समाज को जोड़कर रखती थी।

कई उदाहरण हैं: मुस्लिम कारीगर दुर्गा पूजा की प्रतिमाएँ बनाते थे, उत्तराखंड की कांवड़ यात्रा के लिए कांवड़ मुस्लिम बनाते थे। मुग़ल दरबार के बड़े चित्रकार हिंदू थे, जिन्होंने इस्लामिक कला फ़ारसी कलाकारों से सीखकर अपनाई। यह सब रोज़गार और काम की ज़रूरत से जुड़ा था।

आज कुछ लेखक और तथाकथित इतिहासकार कहते हैं कि ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ एक कृत्रिम निर्माण है, जिसे बाद में नेहरू और अन्य लोगों ने गढ़ा। मैं इस बात से असहमत हूँ। यह कृत्रिम नहीं था, बल्कि हमारी सामाजिक संरचना ने इसे गढ़ा था। अंग्रेजों के आने से पहले कोई बड़े दंगे दर्ज नहीं हैं। सारे दर्ज दंगे 1857 के बाद हुए और उनके कारण वही थे जो आज भी हैं—रामनवमी यात्रा, गौ-रक्षा, गौ-हत्या।

विलियम डैलरिम्पल की किताब ‘द लास्ट मुग़ल’ में बहादुर शाह ज़फ़र का फरमान उद्धृत है कि बकरीद पर गौ-हत्या नहीं होगी। कई मुसलमानों ने अनुमति माँगी थी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसका मतलब है कि पहले यह प्रथा आम नहीं थी।

तो मेरा उद्देश्य यही है कि अगर हम अपनी विरासत को सही ढंग से समझें, तो शायद हम अपने भविष्य को बेहतर बना सकें। जिस तरह की नफ़रत का हम आज शिकार हैं, उम्मीद है कि यह केवल हमारी पीढ़ी तक सीमित रहे और आगे आने वाली पीढ़ियाँ अपनी असली विरासत को पहचान सकें।

गौरव तिवारी: मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से यह किताब बहुत आशा देने वाली है। इसमें बताया गया है कि एक विस्तृत ऐतिहासिक कालखंड रहा है, जिसमें शासक वर्ग की धार्मिक प्राथमिकताएँ ज़रूर थीं, लेकिन उनका प्रभाव व्यापक सांस्कृतिक स्तर पर नहीं पड़ा और न ही उनका कोई सर्वव्यापी असर हुआ।

यहाँ तक कि आज़ादी के आंदोलन में भी, विभाजन मौजूद होने के बावजूद, ऐसे दौर आए जब परस्पर सम्मान और साथ मिलकर काम करने के उदाहरण सामने आए।

इसलिए मेरे लिए यह किताब प्रेरणादायक है। यह दिखाती है कि आज का संघर्ष और तनाव कोई स्थायी ऐतिहासिक अवस्था नहीं है। यदि हम लंबी ऐतिहासिक यात्रा को देखें, तो यह एक अपवाद स्वरूप घटना है। और जब हालात सामान्य होंगे, तो हम फिर उसी समाज की ओर लौटेंगे—जहाँ परस्पर सम्मान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व हमारी पहचान रहा है।

साक्षात्कार के वीडियो के लिए

भाग 1-https://youtu.be/2ey8YirSKWg?si=9LucMDRg4oVkO66h 
भाग 2- https://youtu.be/vP_0l9pl_Qo?si=mdMJMSmFw4qdtmSy

 
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