बिहार विधानसभा चुनाव दो चरणों में होंगे—पहला चरण 6 नवम्बर को और दूसरा 11 नवम्बर को। नतीजे 14 नवम्बर को घोषित किए जाएंगे। कुल 243 विधानसभा सीटों और 40 लोकसभा क्षेत्रों के साथ, बिहार राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम राज्य है, भले ही यहाँ की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का एक-तिहाई से भी कम हो।
अन्य हिंदी पट्टी के राज्यों के विपरीत, बिहार ने हाल के दशकों में कभी भी किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2014 और 2019 में राष्ट्रीय स्तर पर बहुमत हासिल किया, लेकिन बिहार में अब तक वह सबसे बड़ी पार्टी नहीं बन पाई है। 2015 में भाजपा ने जद(यू) के बिना चुनाव लड़ा और केवल 53 सीटें जीतीं। 2020 में उसने जद(यू) के साथ गठबंधन किया, लेकिन तब भी वह जूनियर पार्टनर रही और उससे कम सीटों पर चुनाव लड़ा। 2025 में भी भाजपा जद(यू) के साथ मिलकर मैदान में है।
इसी बीच, लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद (आरजेडी) पिछले दो चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी तो बनी, लेकिन बहुमत से काफी दूर रही—2015 में 80 और 2020 में 75 सीटें। कांग्रेस, सीपीआई (एमएल), चिराग पासवान की लोजपा (गुट) और प्रशांत किशोर की नई पार्टी जन सुराज जैसी अन्य पार्टियाँ सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन बिहार की गठबंधन-आधारित राजनीति में उनकी भूमिका अहम बनी रहती है।
नीतीश कुमार की ग़ैर-मौजूदगी
नीतीश कुमार 2005 से बिहार की राजनीति पर हावी रहे हैं। वे आठ बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं और भाजपा तथा राजद के बीच गठबंधन बदलते रहे, लेकिन सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखी। 2025 का चुनाव अलग है—उनकी सेहत और सार्वजनिक जीवन में कम सक्रियता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विपक्षी नेताओं, जैसे तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर, ने खुलकर चिंता जताई है, जबकि एनडीए के सहयोगी कहते हैं कि वे बिल्कुल ठीक हैं। लंबे कार्यकाल ने नीतीश कुमार को ब्लॉक स्तर तक की राजनीति की गहरी पकड़ दी है। लेकिन सुशील मोदी के निधन के बाद, एनडीए के पास अब ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी राजनीतिक हैसियत और अनुभव नीतीश के बराबर हो |

मुस्लिम वोटों का बंटवारा
बिहार की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 17% है। 2020 के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम (AIMIM) ने सीमांचल क्षेत्र में राजद के वोट बैंक को नुकसान पहुँचाया और पाँच सीटें जीत लीं थीं। लेकिन 2025 में हालात बदले हुए दिखते हैं। अब बहुत से मतदाता एआईएमआईएम को एक ऐसी पार्टी मानते हैं जो अंततः भाजपा को ही फायदा पहुँचाती है।
उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की सफलता ने इस सोच को और मजबूत किया है कि मुसलमान अगर राजद के पीछे एकजुट हों, तो बिहार में एक मज़बूत धर्मनिरपेक्ष गठबंधन खड़ा किया जा सकता है|
सवर्ण मतदाताओं की उलझन
बिहार की आबादी में सवर्ण मतदाता लगभग 10.5% हैं और लंबे समय से भाजपा के समर्थक रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में पार्टी का ज़ोर ओबीसी वोटों पर बढ़ने से इनमें असंतोष दिखाई देने लगा है।
कैमूर ज़िले के 42 वर्षीय पूर्व भाजपा पदाधिकारी आशीष उपाध्याय कहते हैं, “भाजपा भी अब जाति-आधारित राजनीति करने लगी है और ओबीसी वोटों को लुभा रही है। इसके राज्य नेता अब सबको साथ लेकर चलने की बात नहीं करते। प्रशांत किशोर ही ऐसे नेता हैं जो हर वर्ग की समस्याओं पर बात कर रहे हैं।”
उनकी यह भावना अमेरिका में बसे एक बुज़ुर्ग रिश्तेदार भी साझा करते हैं। वे पहले भाजपा समर्थक थे, लेकिन अब खुलकर प्रशांत किशोर की सिफारिश करते हैं।
भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का तेज़ उभार भी कई सवर्ण समर्थकों को खटक रहा है। उनका मानना है कि पार्टी अब अपने पुराने जमीनी कार्यकर्ताओं और परंपरागत समर्थकों से दूर होती जा रही है|

क्या प्रशांत किशोर चर्चा को वोटों में बदल पाएंगे?
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी इस बार पहली बार चुनाव मैदान में है और सभी सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है। अब तक उनकी सफलताएँ उन दलों के साथ रही हैं जिनकी संगठनात्मक जड़ें मज़बूत थीं, लेकिन यहाँ उन्हें शून्य से संगठन खड़ा करने की चुनौती है।
उनके भाषणों ने युवाओं का ध्यान खींचा है। मोहनियां के पहले बार वोट डालने वाले मतदाता नीरज यादव कहते हैं, “जन सुराज पार्टी के संस्थापक के बारे में अच्छी बातें सुन रहा हूँ।” वहीं, सलामू, जो लगभग तीस की उम्र के हैं और उसी क्षेत्र से आते हैं, जोड़ते हैं, “वे अच्छे हैं, लेकिन उनके स्थानीय नेता नहीं हैं, इसलिए जीतना मुश्किल है। ज़्यादा से ज़्यादा वे दूसरे दलों के वोट काटेंगे।”
ब्लॉक स्तर पर संगठन की अनुपस्थिति के कारण, सोशल मीडिया की लोकप्रियता को वास्तविक वोटों में बदलना प्रशांत किशोर के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा।
बिखरा हुआ विपक्षी गठबंधन
कांग्रेस और राजद अब भी असहज साझेदार बने हुए हैं। कांग्रेस पार्टी ख़ुद को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसके पास जमीनी स्तर पर संघटन की कमी है। 2022 के बोचहां उपचुनाव में उसके उम्मीदवार को नोटा से भी कम वोट मिले थे। पार्टी का मुख्य योगदान राहुल गांधी का राष्ट्रीय चेहरा है, जिनकी भारत जोड़ो यात्रा और वोटर अधिकार यात्रा ने बड़ी भीड़ खींची। फिर भी, युवा कार्यकर्ता राज अभिषेक का कहना है, “पार्टी को इस उत्साह को बनाए रखने के लिए गाँव-गाँव जाकर मतदाताओं से जुड़ना चाहिए था, जो अब तक नहीं हुआ है।”
राजद को कांग्रेस को हाशिये पर रखकर फ़ायदा मिलता है। वह खुद को बिहार में बड़े भाई की भूमिका में पेश करता है और साथ ही 17% मुस्लिम वोटों पर भी दावा करता है। तेजस्वी यादव लोकप्रिय हैं, लेकिन आम धारणा में वे अब भी यादव-मुस्लिम आधार से आगे नहीं बढ़ पाए हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने अपनी छवि को केवल यादव वोटों तक सीमित नहीं रहने दिया है। कांग्रेस के साथ गठबंधन, हालांकि, तेजस्वी की छवि को नरम बनाता है और उन्हें व्यापक एंटी-इनकम्बेंसी (विरोधी लहर) वोट आकर्षित करने में मदद करता है।

नतीजों के राष्ट्रीय असर
इस चुनाव का परिणाम नीतीश कुमार के राजनीतिक करियर का अंतिम अध्याय साबित हो सकता है। पटना की राजनीतिक हलचलों में यह चर्चा है कि भाजपा और राजद की राज्य इकाइयों के बीच एक अनकही समझ बनी रही—2024 के लोकसभा चुनावों के बाद समय से पहले विधानसभा चुनाव कराने के बजाय, दोनों ने कार्यकाल पूरा होने दिया ताकि नीतीश धीरे-धीरे हाशिये पर चले जाएँ। यह उनका अंतिम दौर होगा या नहीं, यह तो समय बताएगा, लेकिन बिहार का फैसला राज्य से कहीं आगे असर डालेगा।
केंद्र में भाजपा के पास केवल मामूली बढ़त है और जद(यू) का अनिश्चित भविष्य उसे एक अस्थिर सहयोगी बनाता है। बिहार में हार एनडीए की संसद में सौदेबाज़ी की ताक़त को कमजोर कर सकती है और प्रधानमंत्री मोदी की चुनावी छवि को और चोट पहुँचा सकती है, जो 2024 के बाद पहले ही दबाव में है। अगर राजद-गठबंधन जीतता है, तो विपक्ष और मज़बूत होगा और भाजपा के लिए विधायी एजेंडा आगे बढ़ाना और कठिन हो जाएगा।
चुनाव में अब सिर्फ़ एक महीना बचा है, नतीजे अनिश्चित हैं—लेकिन दाँव दारअसल राष्ट्रीय स्तर पर लगे हैं।
यह लेख मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था और इसे यहां पढ़ा जा सकता है





