गठबंधन धर्म से अस्तित्व की राजनीति तक: क्यों और कैसे कांग्रेस ने द्रमुक छोड़कर टीवीके चुना
तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में हाल ही में टीवीके सबको चौंकाते हुए 108 सीटें जीतकर 234 सदस्यीय सदन में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इसके तुरंत बाद कांग्रेस ने अपनी दशकों पुरानी साझेदार डीएमके से दूरी बना ली और अपने पाँच विधायकों का समर्थन टीवीके को दे दिया।
कांग्रेस और द्रमुक दोनों इंडिया ब्लॉक के सदस्य हैं, जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का विरोध करते हैं। 2004 के बाद से ये दोनों दल केंद्र और राज्य स्तर पर अक्सर साथ रहे हैं, सिवाय 2013 के उस छोटे अंतराल के जब द्रमुक ने श्रीलंका के तमिलों पर मानवाधिकारों से जुड़ी बहस के चलते यूपीए से अलगाव किया था, और 2016 के विधानसभा चुनावों में फिर साथ आने तक।

पुराने सहयोगी को छोड़कर एक नए और अनपरीक्षित दल के साथ जाना राजनीतिक जोखिम भी है और अवसर भी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि मतदाता और पार्टी समर्थक इसे कैसे देख रहे हैं — क्या यह व्यावहारिक राजनीति है या अवसरवाद?
समानता ज़्यादा, फर्क कम
कांग्रेस के कुछ नेताओं ने पहले ही टीवीके के साथ चुनाव से पहले गठबंधन की संभावना का समर्थन किया था। टीवीके के अध्यक्ष विजय की विचारधारा कांग्रेस के कुछ सिद्धांतों से मेल खाती दिखती है। चेन्नई के सॉफ्टवेयर कंसल्टेंट विनोद कहते हैं, “जब तक विचारधारा मेल खाती है, कांग्रेस ने सही किया है।”
चेन्नई की ऑन्कोलॉजिस्ट निक्की बताती हैं कि टीवीके ने कांग्रेस के पुराने नेता के. कामराज की प्रतिमा अपने मंच पर स्थापित की, यह साझा राजनीतिक विरासत का संकेत है, और इसी को वे दोनों दलों के बीच वैचारिक निकटता का प्रमाण मानती हैं।

फिर भी आलोचक हैं जो इसे विश्वासघात मानते हैं। वेल्लोर की शिक्षिका कुरैसा कहती हैं, “प्रारम्भिक गठबंधन के बाद चुनाव परिणामों के बाद साथी बदलना मतदाताओं के भरोसे का अपमान है।” वरिष्ठ पत्रकार विद्या सुब्रमण्यम चेतावनी देती हैं कि यह कदम उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस की भूमिका पर असर डाल सकता है, जहाँ वह अक्सर जूनियर साझेदार की भूमिका निभाती है।
अवसरवादी या बंधक?
कई कांग्रेस समर्थक और स्थानीय कार्यकर्ता इसे व्यावहारिक कदम मानते हैं। निक्की कहती हैं, “द्रमुक ने कांग्रेस को पर्याप्त स्थान नहीं दिया। टीवीके के साथ जुड़कर कांग्रेस अपनी पैठ बढ़ा सकती है।” उद्यमी आंडवन का कहना है कि पिछले पचास वर्षों में कांग्रेस राज्य में अधिकतर गठबंधनों पर निर्भर रही है।
इक़राम, जो आईटी क्षेत्र में काम करते हैं, बताते हैं कि टीवीके बहुमत से दस सीटें ही पीछे था; ऐसे परिणाम में छोटे दलों का समर्थन निर्णायक बन जाता है। “कांग्रेस ने जनादेश के अनुरूप कदम उठाया,” वे कहते हैं। कांग्रेस के इस कदम से टीवीके का आंकड़ा 108 से बढ़कर 113 हो गया, जो 118 की आवश्यक संख्या से सिर्फ पाँच कम है। यह स्थिति टीवीके को सरकार बनाने के करीब लाती है, पर साथ ही कांग्रेस की निर्भरता भी दिखाती है।
वहीं विद्या सुब्रमण्यम जैसे आलोचक याद दिलाते हैं कि कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़कर प्रभाव बहुत कम रहा है; गठबंधन के बिना उसकी स्वीकार्यता सीमित है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता स्वीकार करते हैं कि चुनाव से पहले द्रमुक के साथ मिलकर लड़ने के बाद अचानक अलग होना तर्कसंगत नहीं दिखता, भले ही टीवीके के साथ गठबंधन कुछ मायनों में बेहतर विकल्प प्रतीत हो।
गठबंधन से परे: राष्ट्रीय संदर्भ और युवा मतदाता
युवा मतदाता और कुछ विपक्षी नेता इस कदम को व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ में देखते हैं। कई युवा इसे धर्मनिरपेक्षता के समर्थन के रूप में देखते हैं और मानते हैं कि भाजपा के शासन में सांप्रदायिकता बढ़ी है। वेल्लोर की कुरैसा कहती हैं, “बीजेपी के शासन में सरकार की कठोरता को अल्पसंख्यक समुदायों को अधिक भुगतना पड़ा है।”
समाजवादी पार्टी के प्रो. सुधीर पवार का तर्क है कि भाजपा की सत्ता की चाह ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया है; ऐसे समय में बिना परिस्थितियों का आंकलन किये गठबंधन के प्रति अडिग रहना विपक्ष के लिए हानिकारक हो सकता है। उनके अनुसार, “कठोर गठबंधन निष्ठा के कारण विपक्ष कमज़ोर करना अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को फायदा दे सकता है।”

कुछ विश्लेषक यह भी कहते हैं कि अन्नाद्रमुक (AIADMK) का भाजपा के करीब जाना संभावित है, और ऐसे परिदृश्य में कांग्रेस ने टीवीके के साथ जुड़कर एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प बनाए रखने की कोशिश की है।
आगे का रास्ता
कांग्रेस की तमिलनाडु में वापसी, फिलहाल सीमित है| पार्टी के सिर्फ पांच विधायक हैं, पर यह संकेत देता है कि राज्य में उसकी भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। फिर भी इतिहास याद दिलाता है कि अकेले चुनाव लड़ने पर कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ा है; 2014 के लोकसभा चुनावों में उसने तमिलनाडु में कोई सीट नहीं जीती और वोट शेयर बेहद कम रहा था।
कांग्रेस के लिए असली चुनौती संगठन को फिर से मजबूत करना है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता कहते हैं, “अगर पार्टी फिर से केवल किसी बड़े दल की सहायक बनी रही, तो उसका भविष्य अंधकारमय ही रहेगा।” छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ नेता सत्यानारायण शर्मा का मानना है कि राज्य स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए कि किस तरह से स्थानीय हितों की रक्षा हो।
राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को भाजपा के वैचारिक विकल्प के रूप में देखा जाता है; यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। द्रमुक छोड़कर टीवीके के साथ जाना अल्पकालिक रूप से समझदारी भरा कदम लग सकता है, पर दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कांग्रेस कितनी ईमानदारी से अपना संगठन मजबूत करती है, स्थानीय स्तर पर जमीन बनाती है, जो काम करने से से पार्टी भागती रही है।






यह लेख तमिलनाडु की राजनीति में आए एक बड़े बदलाव को दिखाता है। इसमें बताया गया है कि कैसे कांग्रेस ने लंबे समय से चले आ रहे “गठबंधन धर्म” को छोड़कर अपनी राजनीतिक ज़रूरतों और भविष्य को देखते हुए TVK का साथ चुना।
लेख यह समझाने की कोशिश करता है कि राजनीति में स्थायी दोस्ती से ज़्यादा महत्व सत्ता, प्रभाव और भविष्य की संभावनाओं का होता है। विजय की बढ़ती लोकप्रियता और युवाओं के बीच उनकी पकड़ ने कांग्रेस को नई दिशा की उम्मीद दी, जबकि DMK के साथ रिश्तों में दूरी लगातार बढ़ रही थी।
साथ ही यह लेख तमिलनाडु की बदलती राजनीति, नए चेहरों के उभार और पुराने गठबंधनों के कमजोर पड़ने की तस्वीर भी पेश करता है। राजनीति में कब कौन किसके साथ खड़ा होगा, यह अक्सर विचारधारा से ज़्यादा परिस्थितियों पर निर्भर करता है — यही इस लेख का मुख्य संदेश है।