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“स्वाधीनता संघर्ष में शिक्षा संबंधी विचार” – सुजीत कुमार सिंह का व्याख्यान – Day 05

  • July 26, 2025
  • 1 min read
“स्वाधीनता संघर्ष में शिक्षा संबंधी विचार” – सुजीत कुमार सिंह का व्याख्यान – Day 05

यह कार्यशाला शिक्षा के पुनराविष्कार की एक गंभीर कोशिश है, जो आनंद, न्याय, श्रम और लोकतंत्र जैसे मूल्यों को शिक्षा के केंद्र में लाने की दिशा में पहल करती है। इस अनोखी कार्यशाला को मीडिया प्लेटफॉर्म The AIDEM कवर कर रहा है और 20 जुलाई 2025 तक होने वाले सभी व्याख्यानों की रिपोर्ट और अंतर्दृष्टियाँ साझा करता रहेगा।

स्थान: क कला दीर्घा, वाराणसी। आयोजक: साखी शोधशाला। संयोजक: प्रो. सदानंद शाही एवं मृदुला सिन्हा। उद्घाटन तिथि: 15 जुलाई 2025।


पाँचवां दिन : “स्वाधीनता संघर्ष में शिक्षा संबंधी विचार” — सुजीत कुमार सिंह का व्याख्यान (19 जुलाई 2025)

कार्यशाला के पाँचवें दिन सुजीत कुमार सिंह ने “स्वाधीनता संघर्ष में शिक्षा संबंधी विचार” विषय पर अपने वक्तव्य में ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और उपेक्षित बौद्धिकों के विचारों के ज़रिए शिक्षा की वैकल्पिक परंपरा को सामने रखा। कार्यक्रम के पर्यवेक्षक प्रवीण कुमार थे।

 

विषय प्रवर्तन

कार्यक्रम का आरंभ संयोजक प्रो. सदानंद शाही ने किया। उन्होंने बताया कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जिन मनीषियों ने शिक्षा पर विचार किया, वे केवल नौकरी या डिग्री नहीं, बल्कि मुक्ति और आत्मनिर्भरता को शिक्षा का लक्ष्य मानते थे।

शिक्षा और अल्पज्ञात मनीषी

सुजीत कुमार सिंह ने अपने वक्तव्य में उन बौद्धिकों को सामने लाने का प्रयास किया जो राष्ट्रवाद के दौर में सक्रिय थे लेकिन मुख्यधारा से ओझल रहे। उन्होंने ‘स्वदेश बांधव’, ‘सरस्वती’, ‘शारदा’, ‘लक्ष्मी’ जैसी पत्रिकाओं के ज़रिए उस कालखंड के वैकल्पिक शिक्षा विचारों को सामने रखा। कुंवर हनुमंत सिंह, रामनिवास शर्मा, श्यामसुंदरदास, अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध जैसे नामों को उद्धृत करते हुए उन्होंने शिक्षा को आत्मिक शक्ति का स्रोत बताया।

 

शिक्षा का उद्देश्य

उनका ज़ोर इस बात पर था कि शिक्षा मनुष्य को मनुष्य बनाए। नौकरी को जीवन का उद्देश्य मान लेना, शिक्षा का अपमान है। उन्होंने कहा कि शिक्षा वही है जो व्यवहार, सोच और संवेदना को परिष्कृत करे — न कि केवल शासकीय सेवाओं की पूर्ति के लिए हो।

 

 वैकल्पिक शिक्षा ढाँचे

उन्होंने लोकहितकारी विश्वविद्यालयों की कल्पना, मातृभाषा में शिक्षा, व्यावहारिक ज्ञान और कृषि-कौशल आधारित पाठ्यक्रमों की चर्चा की। कन्नौमल, रामचंद्र शुक्ल, बलभद्र प्रसाद ज्योतिषी, नवल किशोर जैसे लेखकों के दृष्टांत देते हुए उन्होंने बताया कि स्वदेशी ढंग की शिक्षा को कैसे गढ़ा जा सकता है।

 

औपनिवेशिक शिक्षा की आलोचना

उन्होंने औपनिवेशिक शिक्षा को औपचारिकता, रटंत प्रवृत्ति और नौकरशाही मानसिकता का जनक बताते हुए उसकी आलोचना की। उनका मानना था कि अंग्रेज़ों की शिक्षा नीति ने नेतृत्वकर्ता नहीं, क्लर्क तैयार किए। गांधी और टैगोर के विचारों को उन्होंने वैकल्पिक दृष्टिकोण के रूप में सामने रखा।

 

स्त्री शिक्षा और पितृसत्ता

उन्होंने यह भी कहा कि स्त्री शिक्षा पर ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में भी इसे सीमित दृष्टि से देखा गया। उन्होंने यूरोपीय समाज की स्त्रीविरोधी कहावतों को उद्धृत करते हुए पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण की आलोचना की।

 

पर्यवेक्षक की टिप्पणी

पर्यवेक्षक प्रवीण कुमार ने कहा कि सुजीत कुमार सिंह का वक्तव्य ऐतिहासिक सामग्री से भरपूर था लेकिन उसमें कार्यान्वयन की पद्धति पर कम चर्चा थी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि हम एक ओर यूरोपीय ज्ञान प्रणाली का लाभ उठाते हैं, दूसरी ओर उसकी आलोचना भी करते हैं — यह द्वंद्व एक प्रकार का रोमेंटिसिज़्म भी है।

 

अतिरिक्त टिप्पणियाँ

प्रो. प्रभाकर सिंह (हिन्दी विभाग, बीएचयू) ने कहा कि औपनिवेशिक शिक्षा की आलोचना करते समय हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इसी प्रणाली ने हाशिए के समुदायों के लिए शिक्षा के दरवाज़े खोले।

प्रो. सदानंद शाही ने स्पष्ट किया कि शिक्षा तब तक सार्थक नहीं हो सकती जब तक समाज में समता की स्थापना न हो। उन्होंने भारत को ‘पाखंड प्रधान देश’ कहते हुए जाति और धार्मिक आडंबर की आलोचना की। उन्होंने बुद्ध की उक्ति ‘अप्प दीपो भव’ का हवाला देते हुए पूर्वग्रह से मुक्त सोच की आवश्यकता पर बल दिया।

 

आगामी व्याख्यान

कार्यशाला के अंतिम दिन:

20 जुलाई — रमाकांत सिंह | श्रम और शिक्षा: श्रम के सांस्कृतिक महत्व और शिक्षा से उसके जुड़ाव पर विमर्श।

20 जुलाई (समापन सत्र) — मनीन्द्र नाथ ठाकुर | गांधी की शिक्षा नीति: गांधी की बुनियादी शिक्षा के विचार और 21वीं सदी में उनकी प्रासंगिकता।

 

यह कार्यशाला शिक्षा के पुनराविष्कार की एक गंभीर कोशिश है, जो आनंद, न्याय, श्रम और लोकतंत्र जैसे मूल्यों को शिक्षा के केंद्र में लाने की दिशा में पहल करती है।

इस अनोखी कार्यशाला को मीडिया प्लेटफॉर्म The AIDEM कवर कर रहा है और 20 जुलाई 2025 तक होने वाले सभी व्याख्यानों की रिपोर्ट और अंतर्दृष्टियाँ साझा करता रहेगा।


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