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“शिक्षा की राजनीति – स्त्री, समाज और बौद्धिकता का पुनर्पाठ” – अर्चना सिंह का व्याख्यान – Day 04

  • July 22, 2025
  • 1 min read
“शिक्षा की राजनीति – स्त्री, समाज और बौद्धिकता का पुनर्पाठ” – अर्चना सिंह का व्याख्यान – Day 04

यह कार्यशाला शिक्षा के पुनराविष्कार की एक गंभीर कोशिश है, जो आनंद, न्याय, श्रम और लोकतंत्र जैसे मूल्यों को शिक्षा के केंद्र में लाने की दिशा में पहल करती है। इस अनोखी कार्यशाला को मीडिया प्लेटफॉर्म The AIDEM कवर कर रहा है और 20 जुलाई 2025 तक होने वाले सभी व्याख्यानों की रिपोर्ट और अंतर्दृष्टियाँ साझा करता रहेगा।

स्थान: क कला दीर्घा, वाराणसी। आयोजक: साखी शोधशाला। संयोजक: प्रो. सदानंद शाही एवं मृदुला सिन्हा। उद्घाटन तिथि: 15 जुलाई 2025।


चौथा दिन: “शिक्षा की राजनीति – स्त्री, समाज और बौद्धिकता का पुनर्पाठ” – अर्चना सिंह का व्याख्यान (18 जुलाई 2025)

गोविन्द वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज की प्रो. अर्चना सिंह ने कार्यशाला के चौथे दिन “शिक्षा की राजनीति: स्त्री, समाज और बौद्धिकता का पुनर्पाठ” विषय पर गहराई से संवाद किया। उन्होंने अपने व्याख्यान में स्त्री लेखन, ज्ञान की सत्ता, पितृसत्ता और शिक्षा में लैंगिक समानता की अवधारणाओं की पड़ताल की।

 

ज्ञान का ढांचा और स्त्री की अनुपस्थिति

अर्चना सिंह ने कहा कि ज्ञान कभी भी न्यूट्रल नहीं होता। यह हमेशा किसी शक्ति-संरचना के भीतर निर्मित होता है। उन्होंने सवाल उठाया कि ज्ञान किसने रचा, किसको सौंपा गया, और किसे उससे वंचित रखा गया। उन्होंने यह बताया कि गार्गी, अपाला, मैत्रेयी जैसी विदुषियों की चर्चा ज़रूर होती है, लेकिन उनकी कोई ऐतिहासिक ज्ञान परंपरा स्थापित नहीं हुई।

 

भक्ति और प्रतिरोध का द्वंद्व

मध्यकाल में स्त्रियों के प्रतिरोध की आवाज़ें उभरीं, परंतु वे प्रायः भक्ति की ओर मुड़ गईं। लेखिकाएं सक्रिय थीं लेकिन उनके लेखन को बौद्धिक विमर्श में सम्मिलित नहीं किया गया। उनका अनुभवजन्य लेखन भी ज्ञान की श्रेणी से बाहर रख दिया गया।

 

स्त्री लेखन की उपेक्षा और सीमाएं

उन्होंने ‘स्त्री पुरुष तुलना’ (ताराबाई शिंदे), ‘सीमंतनी उपदेश’ जैसी रचनाओं को उदाहरण स्वरूप रखा और बताया कि कैसे इन लेखनों की वैधता पर ही प्रश्न खड़े किए गए। रुकमाबाई जैसे लेखकों का असर तत्कालीन शासन तक पहुँचा, फिर भी ज्ञान की मुख्यधारा में उन्हें स्थान नहीं मिला। उन्होंने कहा कि “शृंखला की कड़ियां” जैसे लेखन को भी देर से स्वीकृति मिली।

 

संरचनात्मक सीमाएं और प्रणालीगत बाधाएं

उन्होंने कहा कि आज भी विश्वविद्यालयों में जेंडर विमर्श के लिए पर्याप्त ढांचा, संसाधन और प्रणाली नहीं है। नई शिक्षा नीति भले ही समानता की बात करती है, लेकिन वास्तविक बदलाव के लिए विषयवस्तु और दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जब तक अनुभवजन्य लोकपरंपराओं को शिक्षा में स्थान नहीं मिलेगा, तब तक ज्ञान अपूर्ण रहेगा।

 

शिक्षा का स्वामित्व और सजीवता

अर्चना सिंह ने ज़ोर देकर कहा कि शिक्षा का मंच जब तक विशिष्ट वर्ग के स्वामित्व में रहेगा, तब तक समानता अधूरी रहेगी। लोकगीतों पर रिसर्च करने वाले लोग यदि उस लोक को महसूस न करें, तो उनका शोध अधूरा माना जाएगा। शिक्षा को तभी सजीव बनाया जा सकता है जब वह अनुभव और आत्मीयता से जुड़ी हो।

 

पर्यवेक्षक की टिप्पणी

पर्यवेक्षक विवेक सिंह ने कहा कि अर्चना सिंह का व्याख्यान केवल भाषण नहीं, बल्कि गहरा चिंतन और आत्म-मंथन था। उन्होंने स्पष्ट किया कि जेंडर विमर्श पुरुष बनाम स्त्री नहीं है — पितृसत्ता दोनों के भीतर हो सकती है।

कार्यक्रम में प्रो. कमलेश वर्मा, प्रो. जाह्नवी सिंह, प्रो. सदानंद शाही, रवि राय, सना सबाह, राकेश कुमार सहित अनेक प्रतिभागियों की सक्रिय उपस्थिति रही।

 

आगामी व्याख्यान

कार्यशाला के अगले दिनों में विभिन्न वक्ता शिक्षा के विविध पक्षों पर अपनी बात रखेंगे:

19 जुलाई — सुनीत कुमार सिंह | स्वाधीनता संग्राम में शिक्षा संबंधी विचार: स्वतंत्रता आंदोलन में शिक्षा की भूमिका और उसकी समकालीन प्रासंगिकता।

20 जुलाई — रमाकांत सिंह | श्रम और शिक्षा: श्रम के सांस्कृतिक महत्व और शिक्षा से उसके जुड़ाव पर विमर्श।

20 जुलाई (समापन सत्र) — मनीन्द्र नाथ ठाकुर | गांधी की शिक्षा नीति: गांधी की बुनियादी शिक्षा के विचार और 21वीं सदी में उनकी प्रासंगिकता।

 

यह कार्यशाला शिक्षा के पुनराविष्कार की एक गंभीर कोशिश है, जो आनंद, न्याय, श्रम और लोकतंत्र जैसे मूल्यों को शिक्षा के केंद्र में लाने की दिशा में पहल करती है।

इस अनोखी कार्यशाला को मीडिया प्लेटफॉर्म The AIDEM कवर कर रहा है और 20 जुलाई 2025 तक होने वाले सभी व्याख्यानों की रिपोर्ट और अंतर्दृष्टियाँ साझा करता रहेगा।


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