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राघवेन्द्र दुबे

तीन दशकों से अधिक समय तक विभिन्न राज्यों और प्रकाशनों में सक्रिय हिंदी पत्रकारिता के अनुभव के साथ, राघवेन्द्र दुबे भारत के राजनीतिक, सिनेमाई और सांस्कृतिक परिदृश्य को गहरी संवेदनशीलता और पैनी नज़र से देखा है। आज उनका जीवन सूत्र है – “ज़िंदगी से इश्क़ करो” ताकि भरपूर जिया जाए और पूरे जुनून से लिखा जाए। राजनीति, फ़िल्मों और संस्कृति के प्रति उनका अटूट प्रेम आज भी उनकी लेखनी को आकार देता है और उन्हें पाठकों से जोड़े रखता है