इसका प्रचलित उत्तर यह है कि प्रबोधन एक यूरोपीय घटना थी, जो कि यूरोपीय पुरुषों के एक सर्वमान्य और प्रतिष्ठित समूह के प्रमुख कृतियों तथा प्रयासों के फलस्वरूप, अठारहवीं शताब्दी में तर्क, स्वतंत्रता और व्यक्तिवाद के उदय के रूप में सामने आई। इस कहानी में शेष विश्व एक विलंबित प्रतिभागी के रूप में दिखाई देता है, जो उन विचारों का विद्यार्थी है जो साम्राज्य के माध्यम से उस तक पहुंचे। यह “पश्चिम और शेष” का मॉडल है, और यह आज भी इस बात को परिभाषित करता है कि हम तर्क के बारे में कैसे बात करते हैं।
मैं एक अलग सवाल पूछना चाहती हूँ। क्या होता है जब हम गैर-यूरोपीय और ट्रांस अटलांटिक पश्चिमी संदर्भों में, या लंबी सभ्यतागत इतिहास वाले समाजों में हम “एनलाइटनमेंट” (ज्ञानोदय) की तलाश करते हैं? क्या होता है जब हम “एनलाइटनमेंट” से जुड़े विचारों को उन स्रोतों में खोजते हैं जिन्हें मुख्यधारा में जगह नहीं मिली—यानी उन दर्शनों में जिन्हें अक्सर हाशिए पर रखा गया है?
“एनलाइटनमेंट” के विचारों का क्या होता है, जब हम उन्हें उन महिलाओं के बौद्धिक जीवन और तौर-तरीकों में देखते हैं, जिन्होंने दर्शनशास्त्र की मान्य भाषाओं और शैलियों में कभी कोई दार्शनिक ग्रंथ नहीं लिखा? उनकी अपनी स्थानीय भाषाओं में, उनके अपने तरीकों और माध्यमों से, और उनके अपने समय में—”एनलाइटनमेंट” का उनके लिए क्या अर्थ था?

भारतीय महिला विचारकों की ओर रुख करते हुए, सबसे पहली बात जो ध्यान में आती है वह यह है कि कभी भी केवल एक ही प्रबोधन काल नहीं था, जैसा कि वर्चस्ववादी यूरोकेंद्रित और पुरुष-केंद्रित इतिहास के जरिए बताया गया है। जिन समाजों का सभ्यतागत इतिहास लंबा रहा है, उन्होंने इसकी कई लहरों का अनुभव किया है। यूरोप के प्रबोधन काल से जुड़े विचार और राजनीति—जैसे कि पुरोहितों के वर्चस्व की आलोचना, कट्टर धार्मिक मान्यताओं पर संदेह, मानवीय तर्कशक्ति में विश्वास, और
व्यक्ति की गरिमा व स्वतंत्रता का दावा—ये सभी भारतीय इतिहास में भी बार-बार देखने को मिलते हैं, और ये यूरोप के अपने प्रबोधन काल से सदियों पहले से मौजूद थे। जहाँ कहीं भी धर्म कट्टर रूढ़िवादिता और पुरोहितों के नियंत्रण में बदल गया, वहाँ उसके खिलाफ विद्रोह हुआ। भारत में, हिंदू धर्म पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देने के परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म और जैन धर्म का उदय हुआ, और बाद में सिख धर्म भी सामने आया। इन सभी ने अपनी-अपनी स्थानीय शब्दावली और राजनीति विकसित की। ये सभी यूरोप के प्रबोधन काल से कहीं अधिक पुराने हैं।
इन विद्रोहों में महिलाएं शुरू से ही शामिल थीं—कभी विद्रोह के भीतर रहकर, तो कभी बाहर से—और उन्होंने आलोचना, विद्रोह और असहमति की अपनी एक अलग परंपरा कायम की। ऐसी असहमत महिलाओं को अक्सर रहस्यवादी या संत के रूप में पेश किया जाता है, और उनके कार्यों को “भक्ति परंपरा” के दायरे में समेट दिया जाता है, जहाँ “समर्पण” या “भक्ति” की शब्दावली का इस्तेमाल होता है।
हालाँकि भक्ति परंपरा में समर्पण पर काफी जोर दिया गया है, लेकिन इस लेबल की वजह से अक्सर उनके क्रांतिकारी कार्यों और हस्तक्षेपों का असली महत्व छिप जाता है। ये महिला विचारक सवाल उठा रही थीं कि व उनके कार्यों के माध्यम से पूछ रही थीं कि इंसान होने का क्या मतलब है, और इंसान होने के मूल्य से वंचित होने का क्या मतलब है। उनके प्रश्न स्वायत्तता, व्यक्तित्व, आत्म-पहचान, गरिमा, और कई अन्य विषयों से संबंधित थे। उन्होंने ये सवाल अपने निजी अनुभवों और अपने शरीर के जरिए जिए गए यथार्थ से उठाए थे, और इन सवालों की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी।

बौद्ध भिक्षुणियों द्वारा रचित श्लोकों, थेरिगाथा पर विचार करें, जो मौखिक रूप से प्रसारित किए गए और बाद में पाली भाषा में लगभग तीसरी और छठी शताब्दी के बीच लिखे गए। इन महिलाओं ने उस दुनिया के बारे में बात की जिसे वे पीछे छोड़ आई थीं—रसोई, ओखली-मूसल, गृहस्थी का बोझ, और यह अपेक्षा कि एक स्त्री को सुंदर और आज्ञाकारी होना चाहिए। उन्होंने इन्हें ‘इस दुनिया से रिसने वाली विकृतियाँ’ कहकर संबोधित किया। उनका संघ (भिक्षु-समुदाय) में शामिल होना, पितृसत्तात्मक दुनिया के खिलाफ एक कड़ा फैसला था। यहां भाषा के उनके चयन पर भी ध्यान देना चाहिए। संस्कृत उस समय के उच्च-वर्गीय पुरोहित वर्ग की भाषा थी (ठीक वैसे ही जैसे यूरोप के उच्च-वर्ग के लिए लैटिन थी), और जाति-व्यवस्था के कारण यह आम लोगों की पहुँच से दूर थी। इसके विपरीत, पाली आम लोगों की भाषा थी। इसमें लिखना अपने आप में एक राजनीतिक कदम था।
यह पैटर्न पूरे उपमहाद्वीप में देखने को मिलता है। दक्षिण में, अंडाल ने विद्रोही कविताएँ लिखीं, जिनमें इच्छा की पवित्रता का आह्वान किया गया, और धर्म की उन संरचनाओं और संस्थाओं पर सवाल उठाए गए जो महिलाओं के आध्यात्मिक विकास व उपलब्धियों के मामले में महिलाओं के साथ भेदभाव करती थीं। करैकल अम्माइयार ने संस्कृत के बजाय तमिल भाषा में रचनाएँ कीं। वीरशैव परंपरा में, जिसने ब्राह्मणवादी रूढ़िवादिता को चुनौती दी, कई संत-दार्शनिक महिलाएँ थीं। इन्हीं में से एक थीं अक्का महादेवी, जो आगे चलकर इस संप्रदाय की एक गुरु बनीं। वे नग्न रहती थीं और केवल अपने लंबे बालों से शरीर को ढके रखती थीं, और उन्होंने अपने आलोचकों से पूछा कि उसके शरीर और उनके शरीर में क्या अंतर रह गया है, क्योंकि भक्ति तो दोनों में समान रूप से होती है।
विद्वानों का मानना है कि यह परंपरा उन लोगों के लिए भी जगह बनाती है, जो खुद को न न तो पुरुष और न ही महिला के रूप में पहचानते हैं। मध्य भारत में, वारकरी परंपरा को मुक्ताबाई, जनाबाई, बहिणाबाई और सोयराबाई ने समृद्ध किया। आम मराठी भाषा में रचे गए उनके “अभंग” आज भी वार्षिक तीर्थयात्रा के दौरान गाए जाते हैं। बहिणाबाई ने अपनी आत्मकथा भी लिखी, जो उस समय के हिसाब से एक बहुत ही अनोखा और क्रांतिकारी कदम था। पश्चिमी देशों में, विद्वान केवल मीराबाई के नाम से परिचित हैं, लेकिन वह अकेली नहीं थीं। नारीवादी दृष्टिकोण से किए गए शोध कार्यों के जरिए, ऐसी कई संत-दार्शनिक महिलाओं का पता चला है, जिनकी ब्रज, खड़ी बोली और राजस्थानी भाषाओं में लिखी कविताओं, वचनों और रचनाओं का अनुवाद किया गया है। वहीं कश्मीर में, लल्लेश्वरी ने पुरोहित वर्ग की व्यवस्था को पूरी तरह से नकार दिया और इस प्रकार ईश्वर की प्राप्ति में उनकी मध्यस्थ भूमिका को समाप्त कर दिया। इससे उठे प्रश्न महिलाओं की स्वायत्तता पर व्यापक बहस को आगे बढ़ाते हैं और उसमें प्रासंगिकता लाते हैं- अगर ईश्वर ने मुझे बनाया है, तो उस तक पहुँचने के लिए मुझे किसी और की मदद क्यों चाहिए? ये धर्मग्रंथ किसने लिखे, और हमारे लिए इनका अर्थ किसने तय किया? इन महिलाओं ने अलग-अलग क्षेत्रों में और अलग-अलग भाषाओं में लिखा, जबकि अक्सर वे एक-दूसरे को जानती भी नहीं थीं। फिर भी, उनके तर्क काफी हद तक एक जैसे हैं; और यही समानता इसे एक ऐसी परंपरा बनाती है जिसका अपना एक इतिहास है—जो शुरुआती सदियों से लेकर अठारहवीं सदी तक फैला है और आज भी व्यवहार में जीवित है।

इनके विषय नारीवादी दर्शन पढ़ने वाले किसी भी व्यक्ति को परिचित लगेंगे। उन्होंने रसोइखाने के अत्याचार, विवाह में होने वाली हिंसा और महिलाओं पर थोपी गई असमान जिम्मेदारियों के बारे में लिखा। कुछ महिलाओं ने अपनी शादियां तोड़ दीं, जबकि कुछ ने शादी में रहते हुए ही उसे आध्यात्मिक जीवन के साथ जोड़ने की कोशिश की। कई महिलाओं ने तो विवाह की पूरी व्यवस्था को ही सिरे से खारिज कर दिया। भले ही उन्होंने “पितृसत्ता” (patriarchy) शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन उनके विचारों में इसका अर्थ हमेशा मौजूद रहा। उन्होंने मानवीय मूल्य, अपमान और गरिमा, तथा महिलाओं के एक खास तरह से दिखने की अपेक्षाओं के बारे में लिखा। ऐसे दौर में, जब हर पुजारी पुरुष होता था, उन्होंने ईश्वर तक सीधे अपनी पहुंच का दावा किया। उन्होंने शरीर के बारे में भी लिखा— उन्होंने मासिक धर्म और रक्तस्राव के बारे में लिखा, उस शरीर के बारे में लिखा जिसे समाज अपवित्र कहता था और उसी शरीर को ज्ञान के स्रोत के रूप में भी वर्णित किया।। जब एक पुजारी ने मासिक धर्म वाली महिला को मंदिर में प्रवेश करने से रोका, तो उन्होंने जवाब दिया कि यह तो जीवन का स्रोत है, फिर इसे नकारा कैसे जा सकता है? यहाँ शरीर से जुड़े और अनुभव पर आधारित ज्ञान की बात की गई है—एक ऐसा दृष्टिकोण जिसे हम आमतौर पर आज के “इंटरसेक्शनल फेमिनिज़्म” (intersectional feminism) से जोड़कर देखते हैं। उनके तरीके उतने ही विविध थे, जितने उनके विषय। उन्होंने वचनों, वाक्, अभंगों और छंदों के माध्यम से अपनी बात रखी; साथ ही अपने जीवन, अपने विद्रोहों और अपने दर्शन के ज़रिए भी। उनकी शैली में आत्म-स्वीकृति, संवाद, व्यंग्य, तर्क-वितर्क और गवाही जैसे तत्व शामिल थे। उन्होंने ईश्वर, पुरोहितों, समाज और अपने साथी विचारकों के साथ बहस की। उन्होंने अपने अनुयायियों को शिक्षा दी और एक समूह के रूप में मिलकर गीत गाए।
यह बात क्यों मायने रखती है? हमें बताया जाता है कि भारत में नारीवादी सोच औपनिवेशिक आधुनिकता के साथ आई, और महिलाओं को मिल, वोलस्टनक्राफ्ट और सिमोन द बोउआर जैसे विचारकों से पता चला कि वे दबी हुई हैं। महिलाओं की असमान स्थिति को समझाने में इन पश्चिमी नारीवादी दार्शनिकों का योगदान बुनियादी है, जिसे कम करके नहीं आंका जा सकता। लेकिन यह कहना कि भारतीय महिलाओं ने स्वतंत्रता, समानता और मुक्ति के विचार केवल इन्हीं लोगों के ज़रिए सीखे, एक समृद्ध देसी परंपरा को मिटाने जैसा है। समानता से वंचित रखे जाने के कारण, ये महिलाएँ अच्छी तरह जानती थीं कि इसका क्या अर्थ होता है। वे जानती थीं कि अपनी मर्ज़ी और चुनाव के साथ जीने का जीवन कैसा होता है।

थेरीगाथा, भक्ति और वारकरी परंपराओं, तथा कश्मीर और दक्षिण भारत की महिलाओं का अनुभव न तो यूरोपीय आधुनिकता की नकल था और न ही उसे केवल धार्मिक भक्ति तक सीमित किया जा सकता है। उन्होंने अपनी स्थानीय भाषाओं में बौद्धिक और अस्तित्वगत स्तर पर विद्रोह किया। उन्होंने चली आ रही सत्ता को चुनौती दी, ज्ञान के स्रोत के रूप में स्वयं को स्थापित किया और स्वतंत्रता की एक नई परिभाषा गढ़ी।
यदि हम उन्हें गंभीरता से लें, तो हमें इस बात पर पुनर्विचार करना होगा कि “प्रबोधन” (enlightenment) कहाँ से आया और इसका श्रेय किसे दिया जाना चाहिए। लंबे इतिहास वाले समाजों के पास मानवीय स्थितियों के बारे में हमें सिखाने के लिए बहुत कुछ है, और हमने तो अभी बस सुनना शुरू ही किया है।
इस लेख का अनुवाद डॉ. राजहंस ओझा ने किया है जो राजकीय डिग्री महाविद्यालय(जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा से सम्बद्ध ) हुसैनगंज, सिवान में सहायक प्रोफेसर हैं |
उपर्युक्त लेख, कोपेनहेगन विश्वविद्यालय (डेनमार्क) के “Center for Interdisciplinary Research on Women in the History of Philosophy”; द्वारा आयोजित “Developing the Notion of Global Feminist Enlightenments” (वैश्विक नारीवादी प्रबोधन की अवधारणा का विकास) विषयक अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला (5 और 6 अक्टूबर 2026) में उनके द्वारा दी गई प्रस्तुति का एक संक्षिप्त रूप है।
यह कार्यशाला “Towards Global Feminist Enlightenments” (वैश्विक नारीवादी प्रबोधन की ओर) नामक एक व्यापक परियोजना का हिस्सा है, जिसे UCPH (कोपेनहेगन विश्वविद्यालय) के “HUM ग्लोबल ग्रांट” द्वारा वित्तपोषित किया गया है।






भारतीय नारीवादी चिंतन और ज्ञानोदय की परंपरा को यूरोपीय इतिहास के चश्मे से देखने की जरूरत नहीं है। थेरीगाथा से लेकर अक्का महादेवी, अंडाल, मीराबाई और लल्लेश्वरी तक, भारतीय महिलाओं ने सदियों पहले ही पितृसत्ता, धार्मिक रूढ़िवाद, सामाजिक भेदभाव और पुरुष वर्चस्व को चुनौती दी थी। उनके विचार केवल आध्यात्मिक अभिव्यक्तियाँ नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, समानता, आत्मसम्मान और स्त्री-अस्मिता के सशक्त घोषणापत्र थे। इतिहास को यूरोप-केंद्रित और पुरुष-केंद्रित नजरिए से मुक्त करके इन भूली-बिसरी महिला विचारकों को उनका उचित स्थान देना आज बेहद जरूरी है।